nirliptata-ka-arth-निर्लिप्तता अर्थात आसक्त न होना । किसी वस्तु किसी चीज के प्रति । मोह माया में न फंसना है । उसकी सुखानुभूति/दुखानुभूति में खुद को शामिल न करना है ।
ऐसा भाव तभी आएगा जब हम उस ईश्वर या इस सृष्टि के रचयिता को जान पाएंगे । उसकी प्रकृति को समझ पाएंगे । यहां हर क्रिया के पीछे एक कारण है । जिसके पीछे उस सत्ता का संचालन है । जिसे पूर्ण समर्पण के साथ स्वीकार कर पाएंगे । खुद के भीतर विराजमान "मैं" केवल भाषित है । मेरे द्वारा कुछ भी नहीं हो रहा है ।
nirliptata-ka-arth-
हमारी दृष्टि उस निर्माता की दृष्टि समान होना चाहिए । साथ ही साथ आदर भी ।आदर कहने का मतलब है,, उस सत्ता की स्वीकारोक्ति से है । जिसने बनाया है । जो तटस्थ है । लेकिन उपस्थित सभी जगह है । यहां तक की स्वयं के भीतर और बाहर भी । बस रंग रूप आकार आदि में अंतर है । लेकिन शक्ति एक है । जो हमारे क्रियाशीलता का कारण है । बाह्य रूप केवल छलावा । जब ऐसी दृष्टि मिल जाएगी तो निश्चित ही निर्लिप्तता आ जाएगी । हर सुख/दुःख हमें बांध नहीं पाएंगे । तटस्थ होकर हमें देखना जब आ जाएगा । समझो इस दुनिया में निर्लिप्तता के गुण आ जाएगी ।
निर्लिप्ता बनाम संलिप्तता
आजकल बनावटी चीजों का यूग है । हर चीज बनावटी है । चाहे कोई वस्तु हो या फिर कोई विचार । कहने वाले बड़े ज्ञानी महात्मा बनकर कहते हैं । बड़ी-बड़ी बातों को बहुत ही सरल तरीके से प्रस्तुत करते हैं । लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया होगा । उनके ये विचार उन लोगों के लिए होते हैं जो दूसरे विचारों का समर्थन करते हैं । उनका इरादा ऐसे लोगों को तोड़कर कर अपने विचार में परिवर्तन करना होता है । यह एक प्रकार का जिहादी विचार होते हैं । जो सीधे कोई बात न कहकर उस व्यक्ति पर छोड़ देते हैं जिसकी सोच व्यापक स्तर की नहीं है । उपरी तौर पर यह नेक प्रतीत होता है । लेकिन प्रभाव खतरनाक । ऐसे लोगों का तर्क अपने प्रेम का समर्थन रूप में निकलते हैं । जिधर प्रेम प्रबल होता है , उनके लिए तर्क ढूंढना आसान होता है । ऐसे विचारों को पहचानने के लिए बस लिखने वाले की आलोचनाओं से पता चलता है । केवल एक हिन्दुओं के धर्म पर की गई हो तो समझ जाना तुम्हें वैचारिक रूप से बदलना चाहता है । उसके प्रत्युत्तर में जवाब दे कर देख लेना चाहिए कि उसमें कोई दोगलापन थोड़ी हैं । वह तुरंत अपने नफरती जवाब जारी कर देंगे । ऐसे लोग आजकल सोशल मीडिया पर अधिक मिलेंगे । खासकर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग ।।।

0 टिप्पणियाँ