आज के समय में पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। पेड़ों की कटाई, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने प्रकृति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।यह सब जानते हैं लेकिन पता नहीं क्यों इसे दूसरों की जिम्मेदारी कह कर हर कोई अपना मुंह मोड़ लिया है । आजकल के समय में शिक्षित सभी हैं लेकिन समझने की स्थिति में कोई नहीं है ।
यह हिंदी कविता धरती और बादलों के संवाद के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास करती है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम कितना गंभीर हो सकता है।
🌧️ धरती और बादल का संवाद
धरती की शिकायत है बादलों से—
आजकल बरसते नहीं हो आसानी से।
बादल ने कहा—
तुमने ही तो पेड़ उखाड़े हैं,
निर्मम होकर अपनी ही ज़मीं से,
जो रोकते थे मुझे दूर जाने से।
धरती ने फिर पूछा—
तो फिर क्यों आते हो मेरे पास,
लेकर उम्मीदों के कई एहसास?
दूर रहते,
तो न निराशा होती, न विश्वास।
बादल ठहरकर बोला—
मैं तो हर बार आता हूँ,
तेरी प्यास बुझाने,
तेरे आँचल को हरियाली से सजाने।
पर चलते-चलते मैं देखता हूँ—
तुम्हारा सूना आँचल,
तुमने रोपे ही नहीं
वे नन्हे पौधे,
जो मेरे स्वागत में अचल खड़े रहते थे।
अब मैं नहीं देखता कहीं हरियाली,
न वो सजावट, न वो लाली।
धरती चुप हो गई,
उसकी खामोशी बहुत कुछ कह गई—
“दोष तेरा नहीं,
मैंने ही अपनी गोद उजाड़ी है,
तभी तो आज मेरी ये हालत बेचारी है।”
बादल भी मौन हो गया,
फिर धीमे से बरस गया—
जैसे समझा रहा हो,
अब भी समय है,
सब कुछ फिर से संवर सकता है...!!!
🌱 उजड़ती धरती
धरती देख रही है
खुद को उजड़ते हुए,
एक-एक पेड़
छूटते और कटते हुए।
किसे समझाएँ,
कौन समझेगा—
जो अपने ही लाभ में
सब कुछ लूटते हुए।
जब इंसान खुद ही जानता है,
तो उसे कैसे समझाएँ?
लकड़ी की टंगिया है
खुद को ही काटते जाएँ...!!!
💭 भावार्थ - इस कविता का
यह हिंदी कविता पर्यावरण की समस्या को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें धरती और बादल के संवाद के माध्यम से यह बताया गया है कि पेड़ों की कटाई और प्रकृति के दोहन के कारण बारिश और हरियाली कम होती जा रही है।
संदेश- पर्यावरण के लिए
पेड़ लगाना जरूरी है
प्रकृति का संतुलन बनाए रखें
पर्यावरण बचाना हमारी जिम्मेदारी है
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rajkapur Rajput

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