झूठ का ज़माना | सच और झूठ की सच्चाई पर हिंदी कविता truth vs lie poem hindi

परिचय -झूठ और सच कविता का 

आज के समय में अक्सर यह कहा जाता है कि झूठ का ज़माना है। लेकिन क्या सच पूरी तरह खत्म हो गया है? क्या सच में झूठ ही हर जगह जीत रहा है? कहीं - कहीं झूठ का हंसना जरुर खल सकता है लेकिन वास्तविकता दिखावा समान है । भीतर की गहराई से नहीं हो सकता है । सतही तौर पर ज्यादातर लोग झूठ के सहारे से बच तो जाते हैं, मगर आखिर में शर्मिंदगी महसूस ज़रूर होता है । 
यह हिंदी कविता “झूठ का ज़माना” इसी सवाल को उठाती है और समाज की उस सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ सच अब भी मौजूद है—बस उसे देखने की नजर चाहिए।

⚖️ झूठ का जमाना


ठीक है—झूठ का ज़माना है,
मगर इतना नहीं
जितना तूने माना है।
गिर भी जाते हैं,
उठ भी जाते हैं,
रंग भी बदलते हैं—
जैसे कपड़े बदलते हैं।
फिर भी सच का बहाना है,
ठीक है—झूठ का ज़माना है,
मगर इतना नहीं
जितना तूने माना है।
उसकी तरक्की का भी कारण है—
अपनों का गला काटकर किया रण है।
तुम न समझोगे, “राज”,
सुविधा के खातिर
कान खड़े उसके प्रतिक्षण है।
इतना सजग, इतना सियाना है,
ठीक है—झूठ का ज़माना है,
मगर इतना नहीं
जितना तूने माना है।
जीने वाले आज भी जीते हैं,
यहीं खिलते हैं, यहीं मुरझाते हैं।
न छल की ज़रूरत, न झूठ की—
अपनी मेहनत ही काफी है,
बेकार है लूट की।
हर पल आनंद ही आनंद जीना है,
ठीक है—झूठ का ज़माना है,
मगर इतना नहीं
जितना तूने माना है !!!!



न डर झूठ से इतना,

ज़िंदा हो—मगर
मर गए जितना।
सच, सच ही होता है,
झूठ में कहाँ दम है इतना।
झूठ के सहारे
कुछ भी बन सकते हो,
अपनों से भी
दुश्मन बन लड़ सकते हो।
तुम्हें पैसा चाहिए
सुविधा के लिए,
देश-समाज से भी
गद्दारी कर सकते हो।
सुविधा मिलेगी,
लेकिन सुकून नहीं उतना—
ज़िंदा हो, मगर
मर गए जितना।
खिड़कियाँ खोलकर झाँकते हो,
दरवाज़ा खोल कब निकलते हो?
भीड़ में भी
डर बहुत है तुम्हें,
इधर-उधर ही
ताकते रहते हो।
तुम्हें भी डर लगता है उतना,
जितना गैरों को लगता है—
ज़िंदा हो, मगर
मर गए जितना...!!!

- rajkapur rajput 
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कविता का अर्थ 


यह हिंदी कविता हमें यह समझाती है कि भले ही झूठ का प्रभाव बढ़ गया हो, लेकिन सच आज भी मौजूद है। लोग सुविधा और स्वार्थ के लिए झूठ का सहारा लेते हैं, लेकिन अंत में सुकून और संतोष केवल सच के रास्ते पर ही मिलता है।


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