दोगलापन — नीयत का | दोहरे मापदंड और चयनात्मक नैतिकता पर हिंदी कविता

दोगलापन — नीयत का | दोहरे मापदंड और चयनात्मक नैतिकता पर हिंदी कविता dogalapan niyat ka hindi-kavita

दोगलापन -यही है कि अपने लिए सच और झूठ का प्रयोग अत्यंत गुप्त तरीके से करना है । जिसमें झूठ और सच का प्रयोग चालाकी से स्वहितों को ध्यान में रख कर किया जाता है । अपने हितों के लिए रक्षात्मक और दूसरों के लिए आक्रामक रुख कर लिया जाता है । अपने विरोधियों को थकाने, हराने के लिए ऐसे शब्दों का चयन करते हैं । जिसे सभ्य इंसान कहने में संकुचाते हैं । लेकिन वहीं दोगलापन लिए हुए आदमी आसानी से कह देते हैं । जबकि उसी बुराई को अपनो के प्रति गर्व के साथ । दोगलापन केवल शब्दों का विरोधाभास नहीं, बल्कि नीयत का विभाजन है। जब न्याय व्यक्ति देखकर बदलने लगे, जब आस्था और नैतिकता का मापदंड सबके लिए समान न रहे, तब सत्य पीछे छूट जाता है। यह कविता उसी चयनात्मक दृष्टि और दोहरे मानदंडों पर प्रश्न उठाती है। 

दोगलापन — नीयत का

तुम्हें वह अहसास नहीं,

जो मुझे भीतर तक महसूस होता है।

इसीलिए तुम

मेरी आस्था पर

सहज ही प्रश्न उठा देते हो।

तुम्हारे प्रश्नों से मुझे शिकायत नहीं,

शिकायत उनकी दिशा से है।

वे निष्पक्ष नहीं होते,

वे व्यक्ति देखकर बदल जाते हैं।

किसी के अपराध पर

तुम्हारी आँखें बंद हो जाती हैं,

किसी और की भूल पर

तुम्हारी आवाज़ बुलंद हो जाती है।

यही मौन,

यही चयनात्मक विरोध,

तुम्हारी नीयत का परिचय देता है।

जब अन्याय सामने हो

और होंठ मुस्कुराते रहें,

तब वह केवल चुप्पी नहीं होती,

वह भी एक प्रकार का समर्थन होती है।

उसका दावा था

कि वह केवल सच बोलता है।

पर हमें महसूस हुआ—

उसका सच भी

व्यक्ति देखकर बदल जाता था।

कुछ लोगों के लिए वह मुखर था,

कुछ के लिए सुविधाजनक मौन।

अपने और पराए के मोह में

मनुष्य अक्सर सच को खो देता है।

एक ही घटना,

एक ही व्यवहार,

एक ही अपराध—

लेकिन निर्णय दो अलग-अलग।

शायद यही वह क्षण है,

जब न्याय से अधिक

नीयत बोलने लगती है।

पढ़-लिख लेना

शिक्षित होने का प्रमाण नहीं।

शिक्षा का अर्थ

केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं,

बल्कि सत्य के प्रति ईमानदार होना भी है।

यदि विद्वता

न्याय को निष्पक्ष न बना सके,

यदि बुद्धि

चरित्र को ऊँचा न उठा सके,

तो वह शिक्षा अधूरी है।

सच्ची शिक्षा वही है,

जो अपने और पराए के बीच

न्याय का तराज़ू

कभी बदलने न दे।

क्योंकि

दोगलापन विचारों में नहीं जन्मता,

वह नीयत में जन्म लेता है।

और जहाँ नीयत विभाजित हो जाए,

वहाँ सत्य भी

धीरे-धीरे हारने लगता है।

और अंत में कविता 

सत्य की सबसे बड़ी कसौटी यह नहीं कि हम किसके पक्ष में बोलते हैं, बल्कि यह है कि क्या हम एक ही परिस्थिति में सबके लिए एक समान नैतिक मानदंड अपनाते हैं। जहाँ न्याय व्यक्ति देखकर बदल जाए, वहीं से दोगलेपन की शुरुआत होती है।

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-राजकपूर राजपूत 


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