शब्दों का आईना | गाली, क्रोध, विद्वता और मानवीय व्यवहार पर हिंदी कविता

शब्दों का आईना | गाली, क्रोध, विद्वता और मानवीय व्यवहार पर हिंदी कविता Poem on Abuse 

गाली - गुस्से के साथ निकलने वाली बोली है । जो सामने वाले को कमजोर करने तथा अपनी क्षमताओं को प्रगट करने के लिए दी जाती है । जिसे सुन सामने वाले थक सकता है । या फिर बलशाली उसी प्रत्युत्तर में कह सकते हैं । 
शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं होते, वे मनुष्य के भीतर की अवस्था का भी परिचय देते हैं। जब मन में करुणा होती है तो वाणी में संयम दिखाई देता है, और जब मन क्रोध, घृणा या प्रतिशोध से भर जाता है, तो वही भाव शब्दों के रूप में बाहर आने लगते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति की भाषा उसके व्यक्तित्व का दर्पण होती है। यह कविता वाणी, रिश्तों और विचारों की जिम्मेदारी पर प्रश्न उठाती है।

शब्दों का आईना

जब भी
किसी के मुँह से
गालियाँ निकलने लगें,
तो समझ लेना—
उसके भीतर
क्रोध और घृणा
अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुके हैं।
वह जितने अधिक
अपशब्द कहेगा,
उतना ही
क्षणिक संतोष खोजेगा।
उसे लगता है
कि कठोर शब्दों से
वह सामने वाले को
आहत कर देगा।
वह जानता है
कि हर मनुष्य के लिए
उसके अपने रिश्ते
बहुत मूल्यवान होते हैं।
इसीलिए
वह उन रिश्तों को
अपशब्दों का लक्ष्य बनाता है,
ताकि पीड़ा
और गहरी हो सके।
लेकिन वह भूल जाता है
कि जिन रिश्तों का
वह अपमान कर रहा है,
वैसे ही रिश्ते
उसके जीवन में भी हैं।
क्रोध जब
विवेक पर हावी हो जाता है,
तब मनुष्य
अपने और पराए—
दोनों के सम्मान का
ध्यान खो देता है।

गाली
कभी भी
तर्क की भाषा नहीं होती;
वह केवल
असंयमित मन की प्रतिध्वनि होती है।

मुझे लगा
वह विद्वान है,
क्योंकि उसके शब्द
बहुत प्रभावशाली थे।
मुझे लगा
वह समझदार है,
क्योंकि उसकी बातें
सुनने में आकर्षक थीं।
लेकिन समय ने बताया
कि शब्दों की चमक
और विचारों की सच्चाई
हमेशा एक जैसी नहीं होती।
उसने विचार रखे,
पर उनका उद्देश्य
सत्य की खोज नहीं था।
वे केवल
लोगों को प्रभावित करने,
अपना पक्ष मजबूत करने
और अपने उद्देश्य को साधने के लिए
सजाए गए शब्द थे।
विद्वता का प्रमाण
शब्दों की चतुराई नहीं,
बल्कि विचारों की निष्पक्षता,
विनम्रता
और आचरण की सत्यनिष्ठा है।

और अंत में कविता 

शब्द मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति भी हैं और सबसे बड़ी परीक्षा भी। जो व्यक्ति असहमति में भी सम्मान बनाए रखता है, वही वास्तव में परिपक्व कहलाने योग्य है। और जो ज्ञान केवल दूसरों को प्रभावित करने के लिए हो, वह बुद्धिमत्ता नहीं, केवल चतुराई बनकर रह जाता है। सच्चा ज्ञान वही है जो मन में विनम्रता, वाणी में संयम और व्यवहार में सम्मान उत्पन्न करे।

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