ईश्वर: व्यक्ति और अनुभूति लेख God: Person and Experience Article भगवान—यह शब्द मात्र एक सत्ता का संकेत नहीं, बल्कि मानव चेतना की एक गूढ़ अवधारणा है। जैसे ही इसका उच्चारण होता है, मन स्वतः ही एक ऐसी शक्ति की कल्पना करता है जो सर्वज्ञ है, सर्वत्र व्याप्त है और जिसके अधीन सृष्टि का निर्माण, संचालन तथा विनाश होता है। परंतु यह कल्पना सभी के लिए समान नहीं होती। प्रत्येक व्यक्ति की चेतना, अनुभव और बौद्धिक यात्रा के अनुसार भगवान की परिभाषा भिन्न रूप धारण कर लेती है।
God: Person and Experience Article
कुछ लोग ईश्वर को केवल भय के आधार पर स्वीकार करते हैं—नैतिक दंड, पाप और दैवी न्याय के भय से। वे नियमों और कर्मकांडों के जाल में अपने मन को बाँध लेते हैं, मानते हैं कि इससे ईश्वर प्रसन्न होंगे और उनकी कृपा प्राप्त होगी। लेकिन जब भक्ति का मूल आधार भय बन जाता है, तो वह असली चेतना और आत्मिक अनुभूति से कट जाती है।
दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो भय केवल बाहरी शक्ति का अनुकरण है, न कि आत्मा का उत्कर्ष। नियमों का पालन यदि केवल दंड से बचने की चाल है, तो कर्म केवल औपचारिकता बन जाते हैं—मनुष्य का जीवन अपने आप में ही बोझिल होता है, विचारहीन और यांत्रिक। इस स्थिति में, भक्ति केवल “कानूनी अनुपालन” बन जाती है, जबकि उसका सार—अंतरतम से संवाद और प्रेम—लुप्त हो जाता है।
कुछ के लिए भगवान आशाओं और इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम बन जाते हैं। वहीं कुछ लोग उन्हें करुणा, प्रेम और आश्रय का प्रतीक मानते हैं—एक ऐसी शक्ति, जो जीवन की अनिश्चितताओं के बीच स्थिरता प्रदान करती है।
इसके विपरीत, कुछ मन ऐसे भी होते हैं जिन्हें भगवान की कोई अनुभूति नहीं होती। उनके लिए यह अवधारणा केवल सामाजिक परंपरा या मानसिक संरचना मात्र है। वे अनुभव के अभाव में न तो उसका स्वीकार करते हैं और न ही उसका खंडन—बल्कि उसे निरपेक्ष दृष्टि से देखते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो भगवान का अस्तित्व वस्तुगत सत्य से अधिक, अनुभवगत सत्य प्रतीत होता है। भगवान का होना या न होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि मनुष्य उसे कैसे अनुभव करता है। अंततः भगवान वह दर्पण बन जाते हैं, जिसमें मनुष्य अपनी ही चेतना, भय, आशा और प्रश्नों का प्रतिबिंब देखता है।
जब ईश्वरीय सत्ता को अनुभव की वस्तु के स्थान पर सिद्धांत और प्रभुत्व का साधन बना दिया जाता है, तब अध्यात्म अपने मूल स्वरूप से विचलित हो जाता है। कुछ लोग अपने निजी आध्यात्मिक अनुभवों को सार्वभौमिक सत्य मानकर दूसरों पर थोपने लगते हैं। यह आग्रह धीरे-धीरे आस्था से अधिक सत्ता का रूप ले लेता है, जहाँ सत्य का माप संवाद नहीं, बल्कि संख्या और प्रभाव बन जाता है। इसी मानसिकता से धर्मांधता जन्म लेती है, जो विवेक के स्थान पर अंधानुकरण को बढ़ावा देती है।
दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो अध्यात्म का उद्देश्य बाह्य स्वीकृति नहीं, बल्कि अंतःचेतना का जागरण है। जब किसी विश्वास को बलपूर्वक स्वीकार कराया जाता है, तब वह आत्मिक उन्नति नहीं, बल्कि मानसिक दासता को जन्म देता है। इतिहास में हुए अनेक युद्ध इस बात के प्रमाण हैं कि जब धर्म करुणा के बजाय पहचान और वर्चस्व का साधन बन जाता है, तब वह विभाजन और विनाश का कारण बनता है।
संख्या की वृद्धि से संगठन मजबूत हो सकता है, किंतु उससे सत्य की गहराई नहीं बढ़ती। सत्य तो मौन अनुभूति में प्रकट होता है, जिसे न प्रचार की आवश्यकता होती है और न ही दबाव की। सच्चा अध्यात्म व्यक्ति को मुक्त करता है—सोचने की स्वतंत्रता देता है, प्रश्न करने का साहस देता है और अन्य मार्गों के प्रति सम्मान सिखाता है। जहाँ यह स्वतंत्रता नहीं, वहाँ धर्म केवल एक संरचना रह जाता है, चेतना नहीं।
सृष्टि की उत्पत्ति और उसका अंत वस्तुतः दो भिन्न अवस्थाएँ नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो प्रतिबिंब हैं। आदि और अंत के बीच जो भेद दिखाई देता है, वह केवल दृष्टि का है; तत्त्वतः दोनों ही शून्य से उद्भूत और शून्य में लीन होने की प्रक्रिया हैं। शून्य से शिखर तक की यात्रा और शिखर से पुनः शून्य में लौटना—यह चक्र सृष्टि के स्वभाव में अंतर्निहित है।
जो कुछ भी आज रूप, नाम और गति के साथ विद्यमान है, वह एक दिन अपने स्वरूप को त्याग देगा। दृश्य जगत की समस्त वस्तुएँ काल के प्रवाह में विलीन होकर पुनः उस मूल अवस्था में लौट जाएँगी, जहाँ न रूप होगा, न नाम—केवल शांति, नीरवता और स्थिरता होगी। परंतु यह शून्य निष्क्रिय नहीं है; यह सृजन की मौन संभावना है। उसी नीरव शून्यता में सूक्ष्म कंपन जन्म लेते हैं, और वही कंपन आगे चलकर नई सृष्टि का आधार बनते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से शून्य अंत नहीं, बल्कि बीज है। जैसे बीज में वृक्ष की संभावना निहित होती है, वैसे ही शून्य में सम्पूर्ण सृष्टि की संभावना समाहित रहती है। सृष्टि का विनाश वस्तुतः उसका लय है—एक ऐसा विश्राम, जिसके पश्चात पुनः जागृति होती है।
विज्ञान जब तत्वों और पदार्थों का अन्वेषण करता है, तब वह भी अनजाने में इसी दार्शनिक सत्य की पुष्टि करता है। विज्ञान न तो कुछ नया रचता है, न ही पूर्णतः नष्ट करता है; वह केवल रूपों को बदलता है। पदार्थों का संयोजन और विघटन इस बात का प्रमाण है कि परिवर्तन ही सृष्टि का मूल नियम है।
अतः सृष्टि को रेखीय नहीं, बल्कि चक्रीय रूप में समझना ही दार्शनिक सत्य के अधिक निकट है। जहाँ शून्य अंत नहीं, आरंभ है; और आरंभ स्वयं एक दिन पुनः शून्य में विलीन हो जाता है।
ईश्वरीय सत्ता का आत्मसात कोई बाह्य उपलब्धि नहीं, बल्कि अंतर्मुखी विसर्जन की प्रक्रिया है। जब तक चित्त अपने ही विचारों, मान्यताओं और अहं की संरचनाओं से आबद्ध रहता है, तब तक परम सत्ता का साक्षात्कार संभव नहीं होता। विचारों का त्याग ही यहाँ शून्यता नहीं, बल्कि उस मौन की प्राप्ति है जहाँ सत्य स्वयं प्रकट होता है।
निर्लिप्तता का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए उससे असंग होना है। यही हिन्दू दर्शन में मोक्ष की मूल व्याख्या है—कर्म के मध्य अकर्म की स्थिति। व्यक्ति सबके बीच रहते हुए भी दृष्टा भाव में स्थित होता है; वह अनुभव करता है, परंतु बंधता नहीं। यही अवस्था ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाती है। जिससे व्यक्ति स्वयं उस परमसत्ता जैसे भाव में स्थित हो जाते हैं ।
ईश्वर किसी प्रचार, सिद्धांत या बौद्धिक स्थापना का विषय नहीं है। वह स्वयंभू है—न प्रशंसा से पुष्ट होता है, न आलोचना से क्षीण। इसलिए जो ईश्वरीय सत्ता को शब्दों में बाँधना चाहता है, वह उसे सीमित कर देता है। तर्क, कुतर्क और वाद-विवाद वहाँ निरर्थक हो जाते हैं जहाँ अनुभूति का आरंभ होता है।
यह मार्ग उपदेश का नहीं, साधना का है। पहले स्वयं उस पथ पर चलना पड़ता है, अपने अस्तित्व को तपाना पड़ता है, तब जाकर अनुभूति जन्म लेती है। उस अनुभूति को बताया जा सकता है, पर समझाया नहीं जा सकता। यही कारण है कि यह मार्ग अत्यंत कठिन है—क्योंकि इसमें मनुष्य को संसार नहीं, स्वयं को पार करना होता है। मन की विकृतियों को निकालकर बाहर फेंकना पड़ता है । मन की विकृतियों का त्याग ही आत्मा की शुद्धि का मूल मार्ग है। जो केवल भौतिक लाभ के लालच में धर्म परिवर्तन करता है, वह संख्या बढ़ा सकता है, परन्तु आध्यात्मिक उन्नति उसे प्राप्त नहीं होती। धर्म का सार बाह्य आचरण में नहीं, अपितु अन्तर्मन की शुद्धि और विवेक की प्रकाश मानता में निहित है।
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-राजकपूर राजपूत "राज "
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