ज़िंदगी! देख, मैंने तुझे जी लिया | जीवन-प्रेम और आत्मस्वीकार पर हिंदी कविता

ज़िंदगी! देख, मैंने तुझे जी लिया | जीवन-प्रेम और आत्मस्वीकार पर हिंदी कविता zindagi dekh maine tujhe jee liya

जीवन केवल सुखों का नाम नहीं, बल्कि दुखों को स्वीकार करके भी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ने का नाम है। जो व्यक्ति जीवन से शिकायत करने के बजाय उसे गले लगा लेता है, वही सचमुच जीना सीखता है। यह कविता उसी आत्मस्वीकार और जीवन-प्रेम का गीत है।

ज़िंदगी! देख, मैंने तुझे जी लिया


ज़िंदगी! देख,
मैंने तुझे जी लिया।
सुख भी पिया,
दुःख भी पिया,
हर रंग को
अपने हिस्से का मान लिया।

तुम जैसी भी मिली,
स्वीकार किया।
तेरे हर रूप से
मैंने प्रेम किया।

अब सफ़र से डर नहीं लगता,
चलना मुझे आ गया।
ज़िंदगी! देख,
मैंने तुझे जी लिया।

कभी ठहरना मेरे पास,
तुझे अपनी साँसों में उतार लूँ।
अपने हर अहसास में
तेरा स्पर्श सँवार लूँ।

यदि कभी
तू मुझे पुकारे,
मैं बिना देर किए
तेरी ओर दौड़ा चला आऊँ।

जो बिछड़ गए थे
वे पल भी लौट आएँ,
और मैं
तुझसे फिर लिपटकर कहूँ—
ज़िंदगी! देख,
मैंने तुझे जी लिया।

इतनी जल्दी
बेवफ़ा मत होना।
जब भी मैं
तुझे आवाज़ दूँ,
मेरे पास आ जाना।

थोड़ी देर ठहरना,
मुझे अपनी बाँहों में भर लेना।
मेरी थकान,
मेरे आँसू,
मेरी मुस्कान—
सब अपने साथ ले लेना।

तेरे लिए
मैं अपना सब कुछ न्योछावर कर दूँ,
क्योंकि अब
तेरे संग मुस्कुराना,
तेरे संग रोना,
तेरे संग जीना
मुझे आ गया है।

ज़िंदगी! देख,
अब मैंने तुझे
सिर्फ़ पाया नहीं—
पूरी शिद्दत से
जी लिया है।
zindagi-dekh-maine-tujhe-jee-liya


और अंत में कविता 

जीवन से प्रेम करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों से हारता नहीं। वह हर अनुभव को स्वीकार करता है, हर संघर्ष से सीखता है और अंत में मुस्कुराकर कहता है—"ज़िंदगी! देख, मैंने तुझे जी लिया।"

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