बचपन कहाँ खो गया | बचपन और बदलती दुनिया पर हिंदी कविता Social ghazal

बचपन कहाँ खो गया | बचपन और बदलती दुनिया पर हिंदी कविता Social ghazal

बचपन जीवन का वह दौर है जहाँ हँसी में बनावट नहीं होती और रिश्तों में स्वार्थ नहीं। समय के साथ मनुष्य अनुभव तो अर्जित करता है, लेकिन कई बार वही अनुभव उसकी सहजता और निष्कपटता को भी कम कर देते हैं। प्रस्तुत कविता इसी परिवर्तन को याद करते हुए बचपन की मासूमियत और आज के जीवन की जटिलताओं के बीच का अंतर उजागर करती है।

समय बदलना स्वाभाविक है, लेकिन बचपन के सरल मूल्य—सच्चाई, अपनापन, मिलकर रहना और सहज मुस्कान—आज भी उतने ही आवश्यक हैं। यदि हम अपने भीतर उस निष्कपटता का कुछ अंश बचाए रखें, तो जीवन अधिक मानवीय और संतुलित बन सकता है।

रिश्तों पर कविता

 जैसे जैसे हम बड़े होते गए

दिल से कम दिमाग के होते गए

वो बचपन की हॅंसी कितने मासूम थे 

आज हंसी बनावटी है चालक होते गए

सोचना क्या शुरू किया तेरे बारे में

सच कम झूठ के शिकार होते गए

कच्चे मकानों जैसी अब ठंडक कहॉं

धीरे-धीरे मकानें कांक्रीट के होते गए

ऐसी बहस में बड़ी है ये सारी दुनिया

जवाब कम है सवालों के होते गए

स्वार्थो में अफवाह फैलाती है दुनिया

सच दिखता नहीं झूठे के शिकार होते गए !!!

बचपन पर कविता 

मैं देख पाता हूॅं बचपन

लेकिन गुजर गया है मेरा बचपन

हमारा शौक ही खुशमिजाजी था

हालांकि आजकल मोबाइल में है बचपन

मिलजुल कर खेला करते थे

लेकिन आजकल अकेले में है बचपन

शिकायत नहीं है मेरे बचपन से

बेशक मिलता नहीं है मेरे जैसे बचपन !!!!

---राजकपूर राजपूत''राज''

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