तुम कहीं भी रहो | निस्वार्थ प्रेम और दुआ पर भावपूर्ण हिंदी कविताTum-kahi-bhi-raho
प्रेम के पास रखने की अपेक्षा, उसके दिलों में बस जाना श्रेष्ठकर है । किसी बंधन में डालना मतलब क़ब्जे में रखना है । प्रेम, प्रेमी के लिए उन्मुक्त जगहों का निर्माण करते हैं । न कि बंधनों में बांधते हैं । उसकी खुशी में खुशी का अहसास करता है।प्रेम का सबसे सुंदर रूप वह है जिसमें साथ की ज़िद नहीं, बल्कि प्रिय की खुशी की कामना होती है। यह कविता उसी निस्वार्थ प्रेम की अभिव्यक्ति है।
तुम कहीं भी रहो कविता
तुम कहीं भी रहो,
सदा खुश रहो।
मेरे दिल में रहो,
या मैं तेरे दिल में रहूँ,
या अपने ही घर में रहो।
ये दुआ है हमारी,
ये चाहत है मेरी,
हर हाल में
आबाद रहो।
तुम कहीं भी रहो।
तुम कहीं भी रहो,
ये तुम्हारी मर्ज़ी है।
हम तुम्हें चाहेंगे,
ये हमारी मर्ज़ी है।
हम इतना ही जानते हैं—
तुम्हारी खुशी में
हमारी खुशी है।
तुम कहीं भी रहो।
चाहे मेरे पास रहो,
या बहुत दूर रहो,
मेरे दिल का रास्ता
तुम तक ही जाता है।
दूरी बदल सकती है,
मोहब्बत नहीं।
तुम कहीं भी रहो।
मैंने चाहा है तुझे
बिना किसी शर्त के,
बिना किसी सौदे के।
मेरा प्रेम
कभी दावा नहीं करता
तुझे अपने पास रखने का।
बस इतनी-सी चाहत है—
मुझे शामिल रखना
अपने अहसासों में।
तुम कहीं भी रहो।
जब कभी
ज़िंदगी थका दे तुम्हें,
मेरी दुआ याद कर लेना।
जब कभी
दुनिया रुला दे तुम्हें,
मेरा नाम याद कर लेना।
मैं वहीं मिलूँगा
जहाँ तुम्हारी मुस्कान होगी।
तुम कहीं भी रहो।
तू हँसता रहे,
यही मेरी इबादत है।
तेरी हर खुशी
मेरी दुआ है।
मेरे हिस्से के सुख भी
तुझे मिल जाएँ,
यही मेरी आरज़ू है।
तुम कहीं भी रहो।
मैंने कभी
तुझे पाने की ज़िद नहीं की,
बस इतना चाहा—
तेरे जीवन में
मेरी याद
एक सुकून बनकर रहे।
तुम्हारी खुशी में
मेरी खुशी है।
तुम्हारी मुस्कान में
मेरी दुनिया है।
तुम कहीं भी रहो।
सदा खुश रहो।
1 टिप्पणियाँ
Nice
जवाब देंहटाएं