बिना पते की चिट्ठी-भाग अट्ठारह Letter Without Address - Part Eighteen अगली शाम आसमान पर हल्के-हल्के बादल छाए हुए थे। सूरज ढलने की तैयारी में था और पार्क में फैली ठंडी हवा किसी अनकहे तनाव को अपने साथ बहा रही थी। पार्क के कोने में लगी एक बेंच पर जोहन पहले से बैठा हुआ था। उसकी नज़र बार-बार घड़ी पर जा रही थी, लेकिन उसका मन समय में नहीं, बल्कि शालिनी के ख्यालों में उलझा हुआ था। हर गुजरती आहट पर वह सिर उठाकर देखने लगता, मानो शालिनी उसी पल उसके सामने आ जाएगी।
कुछ देर बाद शालिनी धीमे कदमों से आती हुई दिखाई दी। उसका चेहरा थका हुआ था, आँखों में डर और असमंजस साफ झलक रहा था, जैसे वह किसी अंदरूनी लड़ाई से जूझ रही हो। जोहन उसे देखते ही उठ खड़ा हुआ।
Letter Without Address - Part Eighteen
“तुम आ गईं,” उसने राहत की साँस लेते हुए कहा, मानो लंबे इंतज़ार के बाद उसकी बेचैनी को थोड़ा सुकून मिला हो।
शालिनी बिना कुछ बोले उसके पास आकर बैठ गई। कुछ पल दोनों के बीच गहरी खामोशी पसरी रही। वह खामोशी शब्दों से ज़्यादा भारी थी। फिर जोहन ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया और बोला,
“शालिनी, मैं तुम्हारी इस चुप्पी को अब और सहन नहीं कर सकता। अगर हम आज भी कुछ तय नहीं करेंगे, तो हालात और बिगड़ते चले जाएँगे।”
शालिनी की आँखें भर आईं।
“मैं कोशिश करती हूँ, जोहन…” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “लेकिन घर में जैसे ही बात छिड़ती है, सबकी नज़रें मुझ पर टिक जाती हैं। माँ की उम्मीदें, पापा की सख़्ती—सब मुझे जकड़ लेते हैं। मुझे डर लगता है कि कहीं सब कुछ टूट न जाए।”
जोहन के चेहरे पर पीड़ा साफ झलक आई।
“तो ऐसे में हम क्या करें?” उसने भारी मन से कहा। “तुम नहीं जानती, तुम्हारे भाई रवि ने मेरे साथ कैसा व्यवहार किया है। उसने मुझ पर हाथ तक उठा दिया। मैं जानता हूँ कि वह मुझे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। फिर भी मैं चुप रहा, क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ। अगर मैं कुछ कहता, तो तुम्हें बुरा लगता।”
कुछ पल फिर सन्नाटा छा गया। शालिनी अपने भाई के स्वभाव से अच्छी तरह वाक़िफ़ थी। उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—जोहन उससे कितना प्यार करता है, इतना कि उसके लिए अपमान और दर्द भी सह लेता है।
धीमे स्वर में उसने कहा,
“अब तुम ही बताओ, जोहन। मैंने तो सब कुछ तुम पर ही सौंप दिया है।”
जोहन ने गहरी साँस ली, मानो कोई बहुत बड़ा निर्णय लेने जा रहा हो।
“हमारे प्यार का कोई रास्ता नहीं है, शालिनी… सिवाय एक के। हमें इस दुनिया को छोड़ देना चाहिए। सब अपनी-अपनी दुनिया में खुश हैं, हमें भी खुश रहने का हक़ है।”
शालिनी चौंक गई।
“कैसे?” उसने घबराकर पूछा। “दुनिया में रहना तो पड़ेगा, चाहे हम कहीं भी हों। हाँ, कुछ रिश्ते मैं छोड़ सकती हूँ… तुम्हारे लिए।”
जोहन के चेहरे पर एक अजीब-सा सुकून उभर आया।
“हाँ, मैं भी यही कह रहा हूँ, शालिनी,” उसने आश्वस्त स्वर में कहा।
“हम दुनिया में रहेंगे, लेकिन दुनिया से अलग। अपनी एक अलग दुनिया बनाएँगे—जहाँ सिर्फ तुम और मैं होंगे।”
ये शब्द शालिनी की आँखों में नए सपने सजाने लगे। उसके मन का डर कुछ पल के लिए पीछे छूट गया। उसने धीरे से अपना सिर जोहन के कंधे पर टिका दिया, जैसे अपना पूरा विश्वास उसी पर रख दिया हो।
हल्की हवा चली, बादल और घने हो गए, और उस बेंच पर बैठे दो दिलों ने अपनी अलग दुनिया की पहली नींव रख दी।
उस शाम के बाद सब कुछ जैसे भीतर-ही-भीतर बदलने लगा।
जोहन और शालिनी रोज़ मिलते नहीं थे, लेकिन रोज़ एक-दूसरे को महसूस करते थे। कभी एक छोटा-सा संदेश, कभी एक अधूरा फोन कॉल—बस इतना ही काफी था कि दिन कट जाए।
लेकिन शालिनी के घर का माहौल और भारी होता जा रहा था।
माँ की आँखें अब पहले से ज़्यादा सवाल करने लगी थीं।
“आजकल कुछ परेशान लगती हो,” वे कहतीं।
पापा का लहजा और सख़्त हो गया था—कम बोलते थे, पर जब बोलते, तो घर में सन्नाटा छा जाता।
और रवि… वह तो जैसे किसी मौके की तलाश में था।
एक शाम, जब शालिनी देर से घर लौटी, रवि ने दरवाज़ा बंद करते ही पूछ लिया—
“कहाँ थी?”
शालिनी घबरा गई।
“कॉलेज में… लाइब्रेरी में,” उसने धीमे से कहा।
रवि हँसा नहीं, मुस्कुराया नहीं।
“झूठ बोलना भी सीख गई है अब?”
उसकी आवाज़ में शक था, गुस्सा था।
शालिनी कुछ नहीं बोली। चुप रहना ही उसने अपनी ढाल बना ली थी।
लेकिन उस रात वह बहुत रोई। तकिये में मुँह दबाकर, ताकि किसी को आवाज़ न जाए।उसकी सिसकियाँ कमरे की ख़ामोशी में घुलती जा रही थीं। हर सिसकी के साथ जैसे वही बात दोहराई जा रही हो—कि इस दुनिया में उसका अपना केवल जोहन ही है। उसके सिवा कोई नहीं। बाकी सब चेहरे उसे कठोर और बेगाने लगते थे। किसी की बातों में सुकून नहीं था, किसी की मौजूदगी में अपनापन नहीं। उसे समझने वाला, उसकी चुप्पियों को पढ़ लेने वाला, और उसके दर्द को बिना कहे महसूस कर लेने वाला सिर्फ़ जोहन था।
जोहन—जिसका नाम होंठों पर आते ही उसकी साँसें कुछ थम-सी जाती थीं। मन का बोझ हल्का होने लगता था। जैसे भीतर जमी सारी पीड़ा पिघलकर आँखों से बह जाना चाहती हो। उस एक नाम में ही उसका भरोसा था, उसका सहारा, और उसकी पूरी दुनिया
और उसी रात उसने जोहन को सिर्फ़ एक लाइन लिखी—
“मैं थक गई हूँ।”
जोहन ने वह संदेश पढ़ा, और देर तक फोन हाथ में लिए बैठा रहा।
उसे समझ आ गया था—अब इंतज़ार और चुप्पी से कुछ नहीं बदलेगा।
अगले दिन वह शालिनी से मिला।
“हम अब ऐसे नहीं चल सकते,” उसने साफ़ कहा।
“तुम रोज़ टूट रही हो, और मैं सिर्फ़ देख रहा हूँ। यह प्यार नहीं है।”
शालिनी की आँखों में डर साफ़ झलक रहा था। वह डर केवल इस पल का नहीं था, बल्कि उन अनगिनत सवालों का था, जो उसकी पूरी ज़िंदगी से जुड़े थे। उसकी निगाहें कहीं टिक नहीं पा रही थीं, जैसे किसी अनजानी राह की तलाश में भटक रही हों।
धीमी आवाज़ में उसने पूछा,
“तो अब क्या करें?”
उसका सवाल छोटा था, लेकिन उसमें पूरी ज़िंदगी की बेचैनी सिमटी हुई थी—आशा, आशंका और भविष्य की उलझनें, सब एक साथ।
जोहन कुछ पल चुप रहा। मानो शब्दों को तौल रहा हो। फिर गंभीर स्वर में बोला,
“एक उपाय है… जिसे अपनाकर हम अपनी एक अलग दुनिया बसा सकते हैं। अगर तुम मानो तो, शालिनी।”
शालिनी ने चौंककर उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर संशय और उत्सुकता दोनों थे।
“क्या उपाय?” उसने तुरंत पूछा।
जोहन ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“सीधे कहूँगा तो शायद तुम मानोगी नहीं।”
शालिनी का धैर्य जवाब दे रहा था। उसने दृढ़ता से कहा,
“पहेलियाँ मत बुझाओ, जोहन। सीधे-सीधे मतलब बताओ। इस वक्त मुझे उलझनों की नहीं, सच की ज़रूरत है।”
उसकी आवाज़ में अब डर से ज़्यादा सच्चाई जानने की तड़प थी, जैसे वह किसी भी कीमत पर अंधेरे से बाहर निकलना चाहती हो।
- क्रमशः
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