Midnight Neighbor - Out of Priorities आधी रात का हमसाया - प्राथमिकताओं से बाहर

 Midnight Neighbor - Out of Priorities आधी रात का हमसाया - प्राथमिकताओं से बाहर 

मुझे बहुत पहले ही आभास हो गया था कि वह मुझसे प्रेम नहीं करती। और करती भी तो क्यों करती? उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि मैं उसके जीवन की प्राथमिकताओं में कहीं शामिल नहीं हूँ। उस क्षण भीतर कुछ ध्वस्त-सा हुआ था—एक अनकहा-सा धक्, और फिर एक गहरी थकान। लगा जैसे आत्मा धीरे-धीरे टूटकर भीतर ही भीतर ज़मीन में धँसती जा रही हो।

वह अक्सर कहा करती थी—“तुम सड़क किनारे खड़े उस पेड़ जैसे हो, जिसकी छाँव में राहगीर कुछ पल विश्राम तो कर सकते हैं, पर उसे अपना स्थायी घर नहीं बना सकते।” उसके शब्दों में कठोरता नहीं थी, पर एक निर्विकार सत्य था, जो हर बार मेरे हृदय पर आकर ठहर जाता।

Midnight Neighbor - Out of Priorities 

कितना दुर्भाग्य है कि जिसे हम पूरे मन से चाहें, वह हमें उसी तीव्रता से न चाहे। मुझे अपनी ही असावधानी पर खेद होने लगा था। जब आत्मा ही शरीर को जीवंत रखती है, तो वह पहले क्यों नहीं चेताती कि यह राह तुम्हारी नहीं है? क्यों नहीं कहती कि लौट चलो, इससे पहले कि उम्मीदें जड़ पकड़ लें?

शायद उसने चेताया भी था—उसके व्यवहार के उन सूक्ष्म संकेतों में, उन क्षणों में जब मन अनायास कचोट उठता था। वह तुममें और दूसरों में कोई भेद नहीं करती थी। जिस आत्मीयता से वह तुमसे मिलती, उसी सहजता से औरों से भी मिलती थी। सब समझ रहे थे, सिवाय तुम्हारे। तुमने उसके साधारण सौजन्य को अपनापन समझ लिया, उसकी सहजता को विशेष अधिकार।

और शायद यहीं तुम हार गए—अपनी ही उम्मीदों से।

तुम्हारी उम्मीदें आखिर कब सपने बुनने लगीं, तुम्हें स्वयं भी पता न चला। कब वे साधारण-सी इच्छाएँ स्मृतियों में सजने लगीं और आत्मा तक को स्पर्श करने लगीं, इसका आभास भी तुम्हें नहीं हुआ। कब प्रेम के बीज मन की भीतरी मिट्टी में चुपचाप अंकुरित हो गए, यह भी तुम जान न सके। जब तुम्हें ही खबर न हुई, तो उसे भला कैसे होती?

तुम्हारा प्रेम उसकी छवि में शांति खोजने लगा। उसकी उपस्थिति, उसका मुस्कुराना, उसका सहज व्यवहार—सब तुम्हारे भीतर एक पवित्र अनुभव की तरह उतरने लगा। तुमने उसके ख्यालों को इतना संजोया कि वे केवल स्मृतियाँ नहीं रहे, बल्कि तुम्हारी आत्मा का हिस्सा बन गए। तुमने अपने मन को ही नहीं, अपनी आत्मा को भी उसकी कल्पना में स्नान करा दिया।

धीरे-धीरे तुम्हारी चाहत एक मौन साधना बन गई। तुमने उसे कोई नाम नहीं दिया, कोई आग्रह नहीं किया; बस भीतर ही भीतर उसे पूजते रहे। तुम्हें लगता रहा कि यह अनुभूति सच्ची है, इसलिए शायद वह भी इसे कहीं न कहीं महसूस करती होगी। पर प्रेम हमेशा साझा अनुभव नहीं होता; कई बार वह एकतरफ़ा उगता है, एकतरफ़ा ही खिलता है, और एकतरफ़ा ही झर भी जाता है।

तुम्हारी भूल यही थी कि तुमने अपनी संवेदनाओं को उसके हृदय की स्वीकृति मान लिया। जबकि वह तो अपने स्वभाव में सहज थी—और तुम उस सहजता को संकेत समझ बैठे।

शायद प्रेम का आरंभ भी ऐसे ही होता है—धीरे, चुपचाप, बिना किसी उद्घोष के। और उसका अंत भी—उतना ही निःशब्द।

मनीष सपनों और स्मृतियों की उलझी हुई गलियों में भटकता हुआ अपने प्रेम का अधूरापन महसूस कर रहा था। हर स्मृति किसी अधूरे वाक्य की तरह थी, जो पूरा होने से पहले ही टूट गया हो। कभी पछतावा उसे घेर लेता—कि काश वह समय रहते समझ जाता; तो कभी पीड़ा की एक गहरी लहर भीतर उठती और उसे निःशब्द कर देती। वह बाहर से शांत था, पर भीतर एक अनवरत कराह गूँज रही थी।

रात अपने अंतिम पहर में पहुँच चुकी थी। अँधेरा हल्का पड़ने लगा था, पर उसके मन का अँधेरा और घना होता जा रहा था। करवटें बदलते हुए उसने जाने कितनी बार आँखें मूँदीं, पर नींद जैसे उससे रूठ गई थी। स्मृतियाँ बार-बार लौट आतीं—उसकी मुस्कान, उसकी आवाज़, उसके शब्द—और हर बार उसके हृदय के किसी कोमल हिस्से को छूकर उसे और बेचैन कर जातीं।

रात बीत गई, पर उसकी बेचैनी नहीं बीती। प्रेम अधूरा था—और वही अधूरापन उसकी जागी हुई आँखों में ठहर गया था। मनीष के पास अब स्वयं से बातें करने के सिवा कुछ भी शेष नहीं था।

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