बदलते नज़रिए | आधुनिक समाज, फैशन और नैतिकता पर हिंदी कविता torn-jeans-poem-hindi
समाज निरंतर बदल रहा है। पहनावा, विचार, जीवन-शैली और संबंधों को देखने का दृष्टिकोण भी समय के साथ बदलता है। यह कविता बदलती सामाजिक मान्यताओं, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मर्यादा और पारिवारिक संवेदनाओं पर विचार करने का एक प्रयास है। इसका उद्देश्य किसी का निर्णय करना नहीं, बल्कि संवाद के लिए प्रश्न उठाना है।
बदलते नज़रिए | आधुनिक समाज, फैशन और नैतिकता पर हिंदी कविता
ग़ैर तो औरतों को
फटे कपड़ों में
भिखारी को देखना बुरा है
फटी जींस में
लड़कियों को देखना
अच्छा है
नजरिये का सवाल है साहब !!
फटी जींस तो क्या हुआ साहब
एक की नजरों में
अश्लील तो
दूजे की नजरों से फैशन है
लोग बदल रहे हैं
नजरियों के हिसाब से
कल सही था आज गलत है !!!
फैशन और नैतिकता
लोग उन बातों को तो कहते हैं
कि चीरहरण हो गया
किसी लड़के ने
किसी लड़की को
गलत निगाहों से देख लिया
क्या कभी गौर किया है
किसी लड़की द्वारा
खुद के अंगों को उघार दिया है
इसे किसी नैतिकता पे रखेंगे !!!
भागी हुई लड़की
सत्रह, अठारह बरस में
बहुत कुछ भूल जाती है
मां बाप का फटकार
उनका दुलार
भाई के झगड़े
प्रेम मगर तगड़े
छोड़ देती है
किसी एक आदमी के लिए
सबकुछ
शायद ! इन सबसे ज्यादा खुशी मिली है
लेकिन मां बाप नहीं भुलते हैं
उसका पालन किया गया प्यार
भाई नहीं भूलते
उनका दुलार
इसलिए याद और गुस्सा
मोहब्बत और नफ़रत आती है
बार-बार
जबकि लड़की इन सबसे
दूर हो जाती है
आसानी से !!!!!
और अंत में कविता
किसी व्यक्ति का मूल्य उसके वस्त्रों, रूप या बाहरी शैली से नहीं, बल्कि उसके आचरण, संवेदनशीलता और दूसरों के प्रति सम्मान से तय होता है। समाज तभी संतुलित बनता है जब स्वतंत्रता और ज़िम्मेदारी, दोनों साथ-साथ चलें।
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