मंज़िल कहाँ थी | विरह, प्रतीक्षा और आत्मबोध पर हिंदी कविता my floor there was thou where the-poem


प्रेम केवल साथ चलने का नाम नहीं, बल्कि अनुपस्थिति में भी किसी की उपस्थिति महसूस करने का नाम है। जब प्रिय दूर होता है, तब स्मृतियाँ ही जीवन का सहारा बन जाती हैं। और कभी-कभी वही खालीपन मनुष्य को स्वयं से मिलने का अवसर भी देता है। प्रस्तुत कविता विरह, आत्मचिंतन और प्रेम में सत्यनिष्ठा की यात्रा को व्यक्त करती है।

मंज़िल कहाँ थी

मंज़िल कहाँ थी,

तू जहाँ थी।

तेरी अनुपस्थिति में भी

तेरी याद बहुत थी।

बसता था मन

उन्हीं स्मृतियों में।

चाहत बहुत थी,


लोग बहुत मिले,

मगर एक खालीपन था

जहाँ तू नहीं थी।


लंबे इंतज़ार में बैठा हूँ,

कभी रोता हूँ,

कभी हँसता हूँ।


मेरी उम्मीद बस यही थी—

तू एक दिन मिल जाएगी।


मेरी प्यास भी वही थी,

मेरी आस भी वही थी।


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खालीपन का अर्थ


मैं अपने खालीपन को,

अपने अस्तित्व को,


उस रिक्तता के पीछे

छिपी हुई ऊर्जा को


धीरे-धीरे पहचान रहा हूँ।


जो रिक्तता के बाद भी

सम्पूर्ण है,


जो स्थिर है,

जो निश्चल है,


और मौन रहकर

सब कुछ देखती है।


उसे ही

अपने भीतर महसूस कर


मैं अपने खालीपन को

भर रहा हूँ।


इसी तरह

मैं जीवन जी रहा हूँ।


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प्रेम का सत्य


यदि तुम

प्रेम में जीना नहीं चाहते,

तो समय रहते

किसी का साथ छोड़ देना।

उस हाथ को

झूठी उम्मीद मत देना,

जिसे अंततः

छोड़ ही देना है।

प्रेम का सबसे बड़ा सम्मान

सच्चाई है।

और सबसे बड़ा धोखा

झूठी आशा देना।

और अंत में कविता 

प्रेम में मिलन जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है स्पष्टता। यदि साथ निभाना संभव न हो, तो भ्रम देने से बेहतर है सच कहना। और जब जीवन में रिक्तता आए, तो वही रिक्तता आत्मबोध का मार्ग भी बन सकती है।

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