मतलब और मोहब्बत | स्वार्थी रिश्तों पर हिंदी कविता matlab aur mohabbat hindi kavita

मतलब और मोहब्बत | स्वार्थी रिश्तों पर हिंदी कविता matlab aur mohabbat hindi kavita

रिश्तों की दुनिया में हर व्यक्ति प्रेम की तलाश करता है, लेकिन हर मिलने वाला प्रेम को उसी दृष्टि से नहीं देखता। कुछ लोग रिश्तों में अपनापन खोजते हैं, तो कुछ केवल अपनी सुविधाएँ और स्वार्थ। ऐसे में सच्चे और स्वार्थपूर्ण संबंधों का अंतर धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगता है। प्रस्तुत कविता इसी द्वंद्व को व्यक्त करती है, जहाँ एक ओर निष्कपट मोहब्बत है और दूसरी ओर मतलब की दुनिया। यह कविता प्रेम, विश्वास, स्वार्थ और मानवीय व्यवहार पर एक भावपूर्ण चिंतन है।

प्रेम और विश्वास गजल 

तुम तो ऐसे कहते हो, मुझे जीना नहीं आता,

तेरी जिरह देख चुका हूँ, तुझे बोलना नहीं आता।


वक्त-वक्त पर बदल जाती हैं तेरे सच की परिभाषाएँ,

बरगलाना तो जानता है तू, समझाना नहीं आता।


अब मैं कहूँ भी तो क्या कहूँ, जो तेरे दिल को लगे,

समझाया है लाख मगर, तुझे समझना नहीं आता।


इसे वक्त की रवानी कहूँ या कोई और फ़साना,

तेरी दुनिया अच्छी होगी, मगर मुझे वैसा जीना नहीं आता।

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तुम तो ऐसे कहते हो, मुझे जीना नहीं आता,

तेरे जैसे मतलब निकालना नहीं आता।


हाँ, यह सच है कि तुम समय बिताने आते हो,

मुझे यूँ ही दिल्लगी करना नहीं आता

मगर मेरा दिल जहाँ लगता है, उसे अपना मान लेता है

मैं रिश्तों को खेल समझना नहीं आता।

मतलबी लोग कविता 

तुम सोचते हो कि पैसा ही सब कुछ है,

मुझे प्यार के सिवा कुछ और नहीं भाता 


गुज़ारिश है तुमसे, मेरे पास मत आओ,

मेरे पास मोहब्बत के सिवा कुछ नहीं।


तुम मतलब पर जीते हो,

मुझे मोहब्बत के सिवा कुछ नहीं आता।

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खुद को तुम समझदार मानते हो,

मतलब निकालने की कला को समझदारी कहते हो।


हम जान गए हैं तेरी फितरत,

फिर भी खुद को समझदार कहते हो।


हवाओं को देखा नहीं जाता,

फिर भी महसूस कर लिया जाता है।


दिखावे से कोई कितना भी सज जाए,

सच अंततः पहचान लिया जाता है।

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धोखा, जालसाजी, स्वार्थ और अजनबीयत,

यही बन जाते हैं कुछ रिश्तों की हकीकत

और उन्हीं के पास है ज़माने की शिकायत 


ज़रूरत तक नाम लेते हैं लोग,

ज़रूरत पूरी होते ही बदल जाते हैं लोग।


स्वार्थ की मंज़िल मिलते ही,

रिश्तों के रास्ते बदल जाते हैं।


और जो कल तक अपने लगते थे,

वही एक दिन अजनबी बन जाते हैं।


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