सियासत पर कविता | जब रिश्तों में स्वार्थ प्रवेश कर जाता है When Politics Is Allowed Poem

सियासत पर कविता | जब रिश्तों में स्वार्थ प्रवेश कर जाता है When Politics Is Allowed Poem

समाज का आधार विश्वास, सहयोग और नैतिकता है। लेकिन जब रिश्तों में स्वार्थ, अवसरवाद और सत्ता की मानसिकता प्रवेश करने लगती है, तो आत्मीयता का स्थान संदेह ले लेता है। प्रस्तुत कविता इसी परिवर्तन पर विचार करती है। यह किसी व्यक्ति या दल पर नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाती है जो रिश्तों को साधन और मनुष्यों को केवल लाभ-हानि के तराज़ू में तौलने लगती है।

सियासत 

जब सियासत को
समाज और रिश्तों में
प्रवेश की अनुमति दे दी जाती है,
तब
रिश्तों की आत्मीयता
धीरे-धीरे कम होने लगती है।
जब सियासत को
बौद्धिक क्षमता
और योग्यता का
पर्याय मान लिया जाता है,
तब
चरित्र से अधिक
चालाकी का मूल्य बढ़ने लगता है।
जब
सत्ता से मिली सफलताओं को ही
सफलता का प्रमाण मान लिया जाता है,
तब
इंसान की नैतिकता
धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है।
फिर
हर व्यक्ति
अपनी-अपनी चाल चलता है,
एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए,
एक-दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए।
दुनिया
अवसरों से अधिक
मौक़ापरस्ती की तलाश करने लगती है।
हर कोई
अपने-अपने लाभ की गणना में
दिनभर उलझा रहता है,
अपनी छवि सँवारने में,
अपनी रणनीतियाँ बनाने में।
ऐसे समय में
सच बोलना कठिन हो जाता है,
क्योंकि
हर व्यवहार के पीछे
कोई न कोई स्वार्थ खोज लिया जाता है।
और विडंबना यह है कि
किसी को दोष भी क्या दें—
यह रास्ता
हमने ही खोला है,
जब हमने
रिश्तों के बीच
सियासत को जगह दे दी।

और अंत में कविता 


रिश्ते विश्वास से बनते हैं, रणनीतियों से नहीं। समाज तब मजबूत होता है जब योग्यता, ईमानदारी और संवेदनशीलता को महत्व मिलता है। यदि हम चाहते हैं कि संबंध टिके रहें और समाज स्वस्थ बने, तो हमें स्वार्थ और अवसरवाद से ऊपर उठकर संवाद, सहयोग और नैतिक आचरण को प्राथमिकता देनी होगी।


Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ