दुनिया नहीं समझती | प्रेम, अकेलेपन और न्याय पर हिंदी कविता poetry on the world
हर सत्य भीड़ को दिखाई नहीं देता। कई बार प्रेम का मूल्य, अकेले संघर्ष का साहस और न्याय की खोज केवल वही समझ पाता है जो उसे जीता है। दुनिया अक्सर संख्या, प्रभाव और शोर को महत्व देती है, जबकि सच्ची संवेदना और न्याय शांत मन से खोजे जाते हैं। यह कविता उसी अंतर्द्वंद्व की अभिव्यक्ति है।
भीड़ का समर्थन हमेशा सत्य का प्रमाण नहीं होता। प्रेम, न्याय और आत्मबल का वास्तविक मूल्य वही समझ सकता है जो उन्हें अपने जीवन में जीता है। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, मनुष्य को अपने विवेक, संवेदना और सत्य के साथ चलना चाहिए।
दुनिया नहीं समझती कविता
दुनिया नहीं समझती
मैं जी लेता हूॅं
उसके बिना
हर दर्द को
सह लेता हूॅं
उसके बिना
बेशक ,
मेरा सफ़र कठिन है
अकेले का
फिर भी
निकल पड़ता हूॅं
बेपरवाह !!!
दुनिया नहीं समझती
किसी प्रेम को
किसी व्यक्ति को
वो तो समझती है
संख्या को
जिसकी जितनी है
उसके इर्द-गिर्द नाचती हैं
दुनिया नहीं समझती न्याय
वो तो समझती है
डर, हल्का, सियासी पंथों, विचारकों के
आक्रमकता से डर कर
राय मान लेती है
उलझकर
ढूंढ नहीं पाती न्याय !!!!
फिर भी
विश्वास है—
सत्य
भीड़ का मोहताज नहीं होता।
प्रेम
प्रमाण नहीं माँगता।
और न्याय,
देर से सही,
पर अंततः
अपने मार्ग तक पहुँच ही जाता है।
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