खोया खोया चाँद /khoya-khoya-chaand-kavita
चाँद हमेशा रात के आकाश में अपनी चमक से सबको मोहता है, लेकिन उसके भी अपने दुख और अकेलापन हैं। यह कविता उसी भावनात्मक यात्रा को दर्शाती है, जहाँ चमक के बावजूद चाँद के भीतर छुपे दर्द और असंतोष का प्रतिबिंब मिलता है।
खोया चाँद कविता
खोया खोया चाँद,
थका थका चाँद,
शीत जमी पर है।
रोया रोया चाँद,
सितारे दूर दूर हैं,
तन्हा तन्हा चाँद।
कई दर्द छुपा के रखा है,
उजला उजला चाँद!!!!
तन्हा चाँद,
बहुत उदास है।
सितारों ने उसे कहा होगा,
"तुममें दाग़ है।"
वो चाहता था कि
ऐसी बातों की परवाह न करें,
मगर नित्य वो संग है !!!!
चाँद और सितारे
कितना असंतोष था उसे,
सितारों की रात में सफर तन्हा काटने वाले ने,
फिर भी चमकता रहा चाँद हमेशा।
इस पर भी सितारों को
कितना असंतोष था!!!!
चाँद भी घर से निकलता है,
तो डरता है
उन आलोचकों से,
सितारों से,
जो एक जगह स्थिर हैं,
जहाँ से
दाग़ ढूँढते हैं।
-राजकपूर राजपूत "राज "

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