फ़ासला | दूरी, प्रेम और रिश्तों की खामोशी पर हिंदी कविता

फ़ासला | दूरी, प्रेम और रिश्तों की खामोशी पर हिंदी कविता

रिश्ते केवल साथ रहने से नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और अपनापन से जीवित रहते हैं। कई बार दूरी किलोमीटरों की नहीं, बल्कि कुछ अनकहे शब्दों की होती है। यह कविता उसी भावनात्मक दूरी और प्रेम की मौन पीड़ा को व्यक्त करती है।

फ़ासला

फ़ासला इतना भी न था,

कि दूरियाँ ख़त्म न होतीं।

बस कुछ लफ़्ज़ ही तो कहे थे तुमसे,

क्या इतनी-सी बात पर

मोहब्बत कम हो जाती?

तेरी नाराज़गी

दिल की बात कह जाती है;

अब तो तुमसे

मुलाक़ात भी नहीं होती।

कुछ बातें

सिर्फ़ दिखावे की होती हैं,

क्या रिश्तों में

इतनी-सी समझ भी नहीं होती?

----+++++++----------


उसे मोहब्बत भी नहीं थी

उसे मोहब्बत भी नहीं थी,

नफ़रत भी नहीं थी।

बस यूँ ही

रिश्तों से बचता रहा,

मानो किसी की

अहमियत ही नहीं थी।

______+_______

फ़ासला इतना न रख

फ़ासला इतना न रख,

कि पास होकर भी

दूरियाँ दिखाई दें।

शहरों का अनजानापन,

कामों की व्यस्तता

रिश्तों पर भारी न पड़े।

तुम चाहो तो

अपने आसपास भी

प्रेम देख सकते हो।

जहाँ प्रेम होता है,

वहीं ज़िंदगी की

खुशबू महसूस होती है।

और अंत में कविता 

प्रेम में सबसे बड़ी दूरी स्थान की नहीं, बल्कि मौन की होती है। यदि मन में अपनापन बचा रहे, तो दूरियाँ भी रिश्तों को नहीं तोड़ पातीं। लेकिन जब संवाद समाप्त हो जाए, तो पास रहकर भी लोग अजनबी हो जाते हैं। इसलिए प्रेम का सबसे बड़ा आधार विश्वास, संवेदना और बातचीत है।


इन्हें भी पढ़ें 👉 इंसान की फितरत 

फासला काम न आया 


Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ