चयनात्मक नज़र | दोहरे मापदंड और सामाजिक सोच पर हिंदी कविता chayanatmak nazar hindi-kavita
समाज में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कई बार लोग सत्य को नहीं, बल्कि अपनी सुविधा के अनुसार सत्य का चयन करते हैं। एक ही घटना पर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए जाते हैं। यही चयनात्मक सोच, दोहरे मानदंड और पूर्वाग्रह रिश्तों तथा समाज में दूरी पैदा करते हैं। यह कविता उसी मानसिकता पर एक व्यंग्य है।
दोहरे मापदंड पर हिंदी कविता
मैं जानता हूॅं
तेरे शब्दों को
सेलेक्टिव है
एक ऑंख से काना
दूसरे से एक्टिव है
तुमसे उम्मीद ही क्या
जो सदा नेगेटिव है
दुसरों की खुशी देखी न गई
खुद के लिए पाॅजिटिव है!!!
किसी ने एक्टिव की
किसी ने सेलेक्टिव की
विचारों की बिसात पर
कोई एक्टिंग की
बदलना था माहौल यहां
स्लीपर सेल एक्टिव की
नहीं जिसे कोई मतलब इंसानियत से
सही बातों को नेगेटिव की
अभी उसमें सभ्यता आई कहां
कानी आंखों से एक्टिंग की !!!!
और अंत में कविता
सत्य का मूल्य तभी है जब उसे बिना पक्षपात के स्वीकार किया जाए। यदि हम केवल अपने पक्ष के अनुरूप तथ्यों को चुनते हैं और बाकी को अनदेखा कर देते हैं, तो यह दृष्टिकोण समाज में विश्वास और संवाद दोनों को कमज़ोर करता है। निष्पक्षता, विनम्रता और आत्मचिंतन ही स्वस्थ विचारों की पहचान हैं।
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