पहले ही बता देना था | अधूरी मोहब्बत, भ्रम और आत्मबोध पर हिंदी कविता prem bhram aur rishton ki sachchai kavita

पहले ही बता देना था | अधूरी मोहब्बत, भ्रम और आत्मबोध पर हिंदी कविता prem bhram aur rishton ki sachchai kavita 

प्रेम में सबसे बड़ी पीड़ा अक्सर अस्वीकार नहीं, बल्कि भ्रम होता है। जब एक व्यक्ति रिश्ते को सच्चाई से जी रहा होता है और दूसरा उसे केवल सुविधा, आदत या समय बिताने का माध्यम मानता है, तब भावनाएँ आहत होती हैं। प्रेम में स्पष्टता, ईमानदारी और सम्मान सबसे महत्वपूर्ण हैं। यदि भावनाएँ एकतरफा हों, तो सत्य को स्वीकार करना ही बेहतर है। रिश्तों का उद्देश्य केवल साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के जीवन में सच्चाई और सम्मान जोड़ना भी है।

यह कविता प्रेम, अपेक्षाओं, गलतफहमियों और आत्मबोध की यात्रा को व्यक्त करती है।

पहले ही बता देना था कविता 

 पहले ही बता देना था

प्यार नहीं तो चेता देना था

मैं खोया रहा तेरी बातों में

सोया था तो जगा देना था

मोहब्बत नहीं थी सीने में

पढ़कर खत जला देना था


जो रिश्ता बन नहीं सकता था,

उसे शुरुआत में रोक देना था।

दिल टूटने का इंतज़ार करने से बेहतर,

पहले ही सच बोल देना था। !!!!


जब मैंने प्रश्न करना सीखा,

तब कई चेहरे बदलते देखे।

जहाँ अपनापन समझा था मैंने,

वहाँ कई स्वार्थ पलते देखे !!!


उसकी मोहब्बत भी अजीब थी 

प्यार में भी शिकायत थी 

बदलना चाहा अपने जैसे 

मगर चुपके-चुपके, सियासत थी 

सियासी पंथों और विचार कविता 

कहता कुछ और था हर बार,

दिल में शायद कोई और हिकायत थी


सीखी थी चालाकी, जिसे लोग समझदारी समझ बैठें 

आलोचना की तो जाना 

अजीब सी नफ़रत थी 

अभी उसे कोई समझा नहीं पाएगा 
खुद को समझें थे, दूसरों की समझ कम थी 

भाईचारे में उलझा रहा मैं 
उसने गला रेत दी थी 

सहभागिता सुनिश्चित नहीं थी उसकी 
एक पर सीधी, दूसरे पर गलत नज़र थी !!!!

सहभागिता उसके स्वभाव में नहीं थी,
सुविधा के अनुसार व्यवहार था।
किसी से अपनापन, किसी से दूरी,
उसका अपना ही संसार था !!!!

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