मेरा प्रेम आग्रह नहीं है | करुणा, समर्पण और अनकहे प्रेम की हिंदी कविता

मेरा प्रेम आग्रह नहीं है | करुणा, समर्पण और अनकहे प्रेम की हिंदी कविता mera prem aagrah nahin hai

सच्चा प्रेम अधिकार नहीं माँगता, न ही स्वयं को सिद्ध करने का आग्रह करता है। वह करुणा, संवेदना और मौन समर्पण का भाव है। जब प्रेम अपेक्षा से ऊपर उठ जाता है, तब वह किसी उत्तर की प्रतीक्षा नहीं करता; वह केवल प्रिय के सुख में अपना अर्थ खोज लेता है। प्रस्तुत कविता उसी निस्वार्थ प्रेम की अभिव्यक्ति है।

मेरा प्रेम आग्रह नहीं है

मेरा प्रेम आग्रह नहीं है,
कि तुम्हें पुकार-पुकार कर

अपने प्रेम का विश्वास दिलाऊँ।

न ही वह
कोई विनती है,
जिसे बार-बार
तुम्हारे सामने रखूँ।
मेरा प्रेम
करुणा है—
तुम्हारे प्रति,
जो तुम्हें देखते ही
मेरे हृदय को
पिघला देता है।
एक मौन करुण उद्गार
भीतर उठता है,
और मेरी आँखें
अनायास भर आती हैं।
मैं स्वयं ही
इस अनुभूति को
पूरी तरह समझ नहीं पाता,
तो तुम्हें
कैसे समझाऊँ
मेरा प्रेम?
मैंने तुम्हें
छूना चाहा,
तुम्हारे स्पर्श में
अपने जीवन का अर्थ
महसूस करना चाहा।
तुम्हें
अपने अस्तित्व का
एक अनमोल हिस्सा बनाकर,
अपने जीवन को
और समृद्ध करना चाहा।
पर मैं
तुमसे प्रेम कैसे करूँ,
जब तुम
उसे स्वीकार करने को
तैयार ही नहीं?
शायद
ज़माने की चाहत
तुम्हें अधिक प्रिय है,
और मैं
उस भीड़ का
हिस्सा नहीं।
जितना तुम्हें चाहा,
तुम उतनी ही
दूर होती गई।
भीड़ में शामिल होकर
तुमने
मुझे भुला दिया।
अब विश्वास करूँ भी
तो कैसे?
तुम्हारी दिल्लगी
और है,
मेरा प्रेम
कुछ और।
फिर भी,
मैं तुम्हें
दोष नहीं देता,
क्योंकि
प्रेम का स्वभाव
पाना नहीं,
चाहना है।

और अंत में कविता 

सच्चा प्रेम आग्रह नहीं करता, अधिकार नहीं जताता और स्वयं को सिद्ध करने की दौड़ में नहीं पड़ता। वह करुणा की तरह निस्संग होकर भी जीवित रहता है। उसका मूल्य स्वीकार किए जाने में नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई में होता है।
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