सब सेलेक्टिव हैं | स्वार्थ, चयनात्मक सोच और बौद्धिक अहंकार पर हिंदी कविता
आज के समय में विचारों से अधिक सुविधा का महत्व बढ़ता दिखाई देता है। लोग अक्सर सिद्धांतों की नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा करते हैं। यही चयनात्मक दृष्टि धीरे-धीरे सामाजिक संवाद, विनम्रता और निष्पक्षता को कमज़ोर कर देती है। यह कविता उसी प्रवृत्ति पर एक व्यंग्य है।
चयनात्मक सोच पर हिंदी कविता
सब यहाँ सेलेक्टिव हैं,
अपने-अपने स्वार्थ में एक्टिव हैं।
मतलब मेल खाए तो सब अच्छा,
वरना हर बात नेगेटिव है।
नफ़रत को मन में पाल रखा है,
प्रेम के मामले में इनएक्टिव हैं।
जब बात हो व्यापार या लाभ की,
तो शब्द बड़े अट्रैक्टिव हैं।
साथ माँगने से नहीं मिलता,
मतलब निकालने में सब सुपर एक्टिव हैं।
सब सेलेक्टिव हैं
कुछ मिलता है
इसलिए एक्टिव हैं
गिरे हुए को सर पे उठाए हैं
मजाल है उसपे सवाल उठाए हैं
इज्जत उसी की है आजकल
गलत करके सर उठाए हैं
सफलता मिलती है गिरकर
लोगों ने मुझे बताया है, जताया है !!!!
सब सेलेक्टिव हैं
अपनी धुन में एक्टिव हैं
वो मानने लगा खुद को
तथाकथित बुद्धिजीवी बताने लगा मुझको
उसके पास तर्क है
पढ़ाई-लिखाई की वजह से
खुद को बताया बड़ा
छोटा मुझको
पढ़ें थे बराबर
लेकिन बोलना नहीं आया
वो कह देते हैं आसानी से
किसी की परवाह नजर नहीं आया
स्मार्ट कहूं तो बेहतर है
दिखावा आजकल का नेचर है
उसके विश्वास में विनम्रता नहीं
बड़ी-बड़ी विद्वत्ता सही
मुर्ख हो गए हैं पढ़-लिखकर
ज़िद कर बैठा खुद को मानकर
तर्क करना उसको अच्छा लगता है
खुद का चरित्र बेहतर नहीं लेकिन अच्छा लगता है !!!!
और अंत में कविता
सच्ची बुद्धिमत्ता केवल ज्ञान अर्जित करने में नहीं, बल्कि उसे विनम्रता, निष्पक्षता और मानवता के साथ जीने में है। यदि हमारी सोच केवल सुविधा के अनुसार बदलती है, तो वह ज्ञान नहीं, चयनात्मक दृष्टि बन जाती है। समाज को आगे बढ़ाने के लिए तर्क आवश्यक हैं, लेकिन तर्क के साथ चरित्र और करुणा भी उतने ही आवश्यक हैं।
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