क्या-क्या भूल गए | इंसानियत और जीवन मूल्यों पर हिंदी कविता Humanity poem
आधुनिक जीवन ने मनुष्य को अनेक सुविधाएँ और अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ एक चुनौती भी आई है—सफलता की निरंतर दौड़। इस दौड़ में कई बार हम उन मूल्यों को पीछे छोड़ देते हैं जो हमें एक अच्छा इंसान बनाते हैं। प्रस्तुत कविता इसी विडंबना पर प्रकाश डालती है कि उपलब्धियाँ बढ़ती गईं, पर संवेदनशीलता, कर्तव्य और इंसानियत कहीं खोती चली गई।
धन, प्रतिष्ठा और ज्ञान जीवन के महत्वपूर्ण साधन हैं, लेकिन उनका वास्तविक मूल्य तभी है जब वे मानवीय मूल्यों के साथ जुड़े हों। सच्ची सफलता केवल कमाने में नहीं, बल्कि ईमान, कर्तव्य, संवेदनशीलता और इंसानियत को बनाए रखने में है। यही संतुलन जीवन को सार्थक बनाता है।
क्या-क्या भूल गए
पैसे कमाने की दौड़ में
दिमाग़ तो खूब लगाया,
मगर
दिल की आवाज़
सुनना भूल गए।
नाम तो कमाया
दौलत के सहारे,
मगर
ईमान की राह
चलना भूल गए।
ज़िंदगी की तलाश में
बहुत दूर तक दौड़े,
मगर
अत्यधिक व्यस्तता में
जीना ही भूल गए।
निजी जीवन सँवारने में
इतने उलझ गए,
कि
समाज के प्रति
अपने दायित्व भूल गए।
पढ़-लिखकर
अधिकार तो जान लिए,
मगर
कर्तव्य निभाना
भूल गए।
अच्छी बातें
बहुत सीखीं,
मगर
उन्हें जीवन में
उतारना भूल गए।
होशियारी तो
बहुत आ गई,
मगर
समझदारी
कहीं पीछे छूट गई।
सुविधाएँ बढ़ीं,
साधन बढ़े,
मगर
संबंधों की ऊष्मा
धीरे-धीरे कम होती गई।
ऐ इंसान!
तेरी चाल-चलन
कैसी हो गई है—
अपने ही स्वार्थ में
तू
इंसानियत भूल गया।
---राजकपूर राजपूत''राज''
2 टिप्पणियाँ
वाह... बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंयथार्थ लिखा है आपने 👌🌷
आभार
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