अपर्याप्त है | अधूरे मिलन और गहरी प्रेमानुभूति पर हिंदी कविता
प्रेम केवल मिल लेने का नाम नहीं है। कुछ मुलाकातें इतनी छोटी होती हैं कि वे मन की प्यास और बढ़ा देती हैं। जब किसी का साथ क्षणभर का हो और उसकी स्मृति भी पूरी तरह मन में न उतर पाए, तब प्रेम अधूरा-सा महसूस होता है। यह कविता उसी अधूरेपन, प्रतीक्षा और गहरी चाह की अभिव्यक्ति है।
अधूरा प्रेम कविता
अपर्याप्त है
तेरा कुछ क्षण
मेरे पास आना।
पानी के बुलबुले-सा
क्षणभंगुर ठहरना,
स्पर्श होने से पहले ही
बिखर जाना।
और मेरी स्मृतियों में
तेरा पूरा अंकन
न हो पाना।
यही तो
मन का अधूरापन है,
जो हर बार
नई नाउम्मीदी जगा देता है।
हृदय तड़प उठता है,
दर्द आँखों तक
छलक आता है।
मेरी साँसें
हवाओं में
तुझे खोजती हैं।
तेरी खुशबू का
एक हल्का-सा एहसास
बेचैन कर देता है,
लेकिन हवाओं के झोंके
उसे भी
मुझसे दूर...
बहुत दूर ले जाते हैं।
अपर्याप्त हैं
तेरी बातें,
तेरी मुलाकातें,
तेरे वादे,
तेरा साथ,
तेरा ख़याल।
जब तक
तेरा प्रेम
मेरे हृदय को
गहराई से स्पर्श न कर जाए,
जब तक
तेरी उपस्थिति
मेरी स्मृतियों में
स्थायी न हो जाए,
तब तक
मन को विश्वास नहीं मिलता।
इसलिए
मुझे छूओ—
सिर्फ़ तन को नहीं,
मेरे मन को।
मेरी स्मृतियों में
इतना गहरा उतर जाओ
कि समय भी
तुम्हारी छाप
मिटा न सके।
तब शायद
मैं कह सकूँगा—
अब मेरा प्रेम
अपूर्ण नहीं,
पूर्ण है।
और अंत में कविता
प्रेम की गहराई समय की लंबाई से नहीं, बल्कि अनुभूति की तीव्रता से मापी जाती है। फिर भी कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जहाँ मन केवल एक क्षणिक मुलाकात से संतुष्ट नहीं होता। वह स्मृति, अपनापन और स्थायी उपस्थिति चाहता है। यही इस कविता का मूल भाव है।
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---राजकपूर राजपूत''राज''
1 टिप्पणियाँ
बहुत बढ़िया
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