एक शराबी और समाजसेवी The Story of a Drunkard and a Social Worker

 The Story of a Drunkard and a Social Worker व्यसन मुक्ति अभियान से जुड़े कर्मयोगी ग्रामवासियों को जीवन के सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे। वे उन्हें यह समझाते कि नशा एक घातक बुराई है, जो न केवल धन-संपत्ति को निगल जाती है, अपितु पारिवारिक सुख-शांति को भी चूर-चूर कर देती है। उनके उपदेशों से प्रेरित होकर ग्रामवासी जागरूक होते, अभियान के लिए यथासंभव सहयोग प्रदान करते और कई सामाजिक कार्यों में भागीदार बनते। विजय इस समस्त अभियान के केंद्रबिंदु, प्रमुख संचालक थे। उस दिन भी वे पूरे समर्पण भाव से गाँव-गाँव जाकर सहयोग राशि एकत्र कर रहे थे और जन-जन में चेतना का संचार कर रहे थे।

The Story of a Drunkard and a Social Worker

वह केवल समाजसेवी नहीं था, बल्कि उसकी राजनीति में भी अच्छी पकड़ थी। वाक्पटुता में निपुण था। लोगों को आकर्षित करने की उसमें अद्भुत क्षमता थी। वह पाखंड-विरोध और वैज्ञानिक सोच का कट्टर समर्थक था। इन्हीं सब खूबियों के कारण वह बहुत शीघ्र उन्नति की राह पर बढ़ा। उसने घर और काफी ज़मीन भी बना ली थी, जिससे उसकी बुद्धिमत्ता का समाज में बहुत सम्मान होता था।

उस दिन भी वह कुछ लोगों को साथ लेकर चंदा वसूली कर रहा था। उसी समय गाँव का ही एक शराबी वहाँ आ गया। विजय उसे समझाने लगा कि शराब बुरी चीज़ है।

शराबी बोला, "रुको... तुम उसे ही समझाते हो जो सबको दिखाई देता है। मैं तो वह बुराई भी देख सकता हूँ, जिसे लोग छिपाकर करते हैं। नशा बुरी चीज़ है, यह सब जानते हैं। पाखंड समाज को आगे बढ़ने नहीं देता, यह भी सही है। शिक्षा आवश्यक है, यह भी अच्छी बात है। लेकिन शिक्षित होकर जब लोग बड़े-बड़े पदों पर बैठकर भ्रष्टाचार करते हैं और खुद को सभ्य कहते हैं, तो वह कितना बड़ा पाखंडी होता है—यह मुझे बताओ।

तुम्हारे पास इतनी जल्दी धन-दौलत कहाँ से आई, यह हम भी जानते हैं। तुम केवल उन्हीं बुराइयों का विरोध करते हो जो सबको दिखती हैं। जो बुराइयाँ लोगों की नज़रों से छिपी हैं, उनका विरोध करो, तब मानेंगे। नशे से भी ज़्यादा घातक आजकल वे लोग हैं जो समाजसेवी बनकर ढोंग करते हैं।"

"चल हट रे, शराबी कहीं का ! "
विजय गुस्से में, ऊँची आवाज़ से कहा ।

वह खिसियाकर वहाँ से चला गया। उसके पीछे उसके साथी भी सिर हिलाते हुए निकल गए। शराबी वहीं खड़ा रहा और भीड़ की ओर देखकर बोला -

"अब हम शराबी हो गए... और ये साहब सभ्य कहलाए!
वाह रे चालाक लोग... अपनी बुराइयाँ तो दिखाई नहीं देतीं,
पर दूसरों में पाखंड खोजने में कोई कसर नहीं छोड़ते।"

शराबी ने कटाक्ष भरे स्वर में कहा ।

वह पास की दीवार से टिककर बैठ गया , उसकी आँखें कुछ सोचती हैं, फिर भीड़ की ओर फिर से देखकर कहा -

" हाँ, मानता हूँ कि नशा बुरी चीज़ है,
मगर उससे भी ज़्यादा बुरा है ढोंग का नशा।
जो शिक्षा, सेवा और संस्कृति की आड़ लेकर
धोखा देते हैं, उन्हें कौन रोकेगा? मैं अपने परिवार का नुक़सान कर रहा हूं लेकिन इस जैसे शिक्षित लोग गांव,  समाज को । "शराबी गंभीर स्वर में कहा ।

वह एक गहरी साँस लेकर ज़मीन की ओर देखता है।

शराबी धीरे-धीरे से -
"इनके बड़े-बड़े भाषण होंगे,
सच्चाई, ईमानदारी, समाज सेवा की बातें होंगी...
पर क्या कभी किसी ने पूछा —
इतनी दौलत, इतना सम्मान, इतनी पहुँच — सब कहाँ से आया?"

वह उठता है और जाते-जाते कहता है-

"मैं तो नशे में हूँ, ये सब जानते हैं।
मगर ये जो होश में रहकर भी समाज को धोखा देते हैं,
उनका क्या?"

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