अफेयर - प्यार व्यार Affair - Love Story

 Affair - Love Story घर का माहौल खराब था। माँ कोने में दुबकी हुई बैठी थीं। पिताजी इधर-उधर टहल रहे थे — नहीं, वे चिंतित थे। बेटा रोए जा रहा था। पास ही एक अनजान लड़की घूँघट डाले बैठी थी। लड़की की उम्र लगभग सोलह वर्ष और लड़के की बीस वर्ष रही होगी। गोविंद का गाँव में बहुत मान-सम्मान था, पर आज सब कुछ मिट्टी में मिल गया। उसे सुधारने के प्रयास में सब चिंतन-मनन कर रहे थे।

Affair - Love Story

"लड़की के घर वालों को खबर पहुंचानी होगी । उन लोगों को बताना पड़ेगा कि उसकी लड़की को हमारा लड़का भगाकर ले आया है । " चिंतित पिता ने अपनी पत्नी से कहा ।


"सत्यानाश हो, ये मर जाते तो सही था । इसी दिन के लिए पाला पोसा है । आज  ऐसा कर रहा है । कल क्या करेगा ! जवानी शुरू हुई है और ऐसा करने लगा । "


मां खिसिया कर बोली । वो अपने लड़के को बार-बार दोष दे रही थी । उसका बेटा आशीष एक लड़की को भगा लाया था।


"नहीं मां, मैंने इसे प्यार किया है,"


बेटे ने आश्वस्त भाव से कहा, जैसे उसने कोई गलती नहीं की हो।


"क्या ख़ाक प्यार किया है! नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर भगा लाया है और कह रहा है, 'प्यार किया है'। अभी तो दाढ़ी-मूंछ भी ठीक से नहीं उगी हैं, और ऐसी हरकतें करता है... छी!"


"नहीं मां, मैं सच कह रहा हूं। मैं शारदा के बिना नहीं रह सकता,"


बेटे ने अपनी प्रेमिका का नाम लेकर कहा।


मां कुछ नहीं बोली। चुप हो गई। बेटा ज़िद कर रहा था।


"हां मां, हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं,"


शारदा ने भी कहा।


"तू चुप कर! ज़्यादा चपलता मत दिखा," मां ने शारदा को झिड़कते हुए कहा।


"जवानी के जोश में होश खो बैठी है तू। मेरा बेटा तुझे पाल पाएगा? जो आज तक खुद अपने लिए कुछ नहीं कर पाया, वो तुझे क्या ज़िंदगी देगा? तुम्हें तो बस प्यार और मस्ती की पड़ी है…!"


उसका स्वर कठोर था—एक मां की चिंता और गुस्से का मिश्रण।


वह अपने बेटे और उस लड़की से लड़ रही थी, पर भीतर ही भीतर डर भी उसे घेर रहा था।


वहीं, पिता अब भी शांत थे, मगर उनकी आँखें बहुत कुछ कह रही थीं।


एक पिता की दृष्टि दूर तक जाती है—वो मुश्किलों की आहट पहले ही सुन लेता है।


वह जानता था, लड़का नाबालिग लड़की को भगा लाया है। अगर लड़की के घरवालों ने शिकायत कर दी, तो मामला पुलिस तक जाएगा। एफआईआर हो सकती है।


और तब...?


उसका बेटा सलाखों के पीछे होगा… एक ग़लती की भारी सज़ा!


"तुम्हारे घर का नंबर है, बेटी?"


पिता ने शारदा से सीधे पूछा।


"हां…" शारदा की आवाज़ धीमी थी, पर विश्वास से भरी।


"तो दो।"


पिता ने गहरी सांस लेते हुए कहा,


"शादी होगी… पर सबकी सहमति से। बिना छुपाव, बिना झूठ के। ताकि आगे चलकर कोई पछतावा न रहे।"


उसकी आवाज़ में दृढ़ता भी थी और अपनापन भी।


इतना सुनते ही लड़के और लड़की — आशीष और शारदा — के चेहरों पर एक अनकही राहत और उजास दौड़ गई।


एक पल को लगा जैसे उनकी दुनिया को मंज़ूरी की धूप छू गई हो।


शारदा ने बिना देर किए फोन नंबर थमा दिया।


उम्र की नादानी थी।


न समझ थी, न दुनिया का तजुर्बा।


प्यार का मतलब क्या होता है, शायद वो भी पूरी तरह न जाना था — पर एक दूसरे के बिना जीने की कल्पना भी अब नामुमकिन लगती थी। उसकी भावनाओं को देखकर ऐसा ही लगता था ।


पिता जानता था।


उसका बेटा बड़ा तो हुआ है, लेकिन केवल शरीर से।


अभी दिमाग़ का विकास उस मुकाम तक नहीं पहुँचा, जहां ज़िम्मेदारी की परछाइयाँ होती हैं।


दिमाग और शरीर का रिश्ता उम्र से तय नहीं होता — अनुभव से होता है।


पिता ने नंबर लिया और शांति से लड़की के घरवालों को सूचना दी।


लेकिन मन फिर भी बेचैन था।


क्या वे समझेंगे?


या आग में घी डाल देंगे?


घंटे भर के भीतर ही लड़की के घरवाले आ पहुँचे।


इस बीच गोविंद — आशीष के पिता — ने अपने घर में सभी को शांत कर लिया था।


कोई हंगामा नहीं हुआ।


न लड़के ने ज़िद की, न लड़की ने रोना-धोना किया।


दोनों चुपचाप बैठे थे — जैसे अपने आने वाले कल की बारे में सोच रहे हों।


उन्हें यकीन था — अब उनकी शादी होगी।


पर गोविंद के मन में गूंजती थी सच्चाई — यह कोई कहानी नहीं है, यह जीवन है।


घर में कदम रखते ही लड़की के एक रिश्तेदार ने ग़ुस्से में आकर शारदा के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया।


कमरे में सन्नाटा छा गया।


लेकिन गोविंद तुरंत आगे आया।


आवाज़ में कठोरता नहीं थी, पर गहराई थी।


"इस उम्र में हो जाती हैं गलतियां... जाने दो।


बैठो, बात करते हैं। ग़लती के बदले ग़ुस्सा नहीं, समझ चाहिए।"


सभी एक कमरे में चले गए।


बाहर आशीष और शारदा की आँखें उसी दरवाज़े की ओर टिकी थीं।


एक ओर डर, दूसरी ओर उम्मीद।


दोनों चुप थे, लेकिन उनके दिल तेज़ी से धड़क रहे थे।


कमरे के भीतर बात हो रही थी —


एक पढ़ा-लिखा, विचारशील व्यक्ति बोला:


"देखिए, इस उम्र में हार्मोनल बदलाव तेज़ होते हैं।


दिमाग़ का विकास उस गति से नहीं हो पाता।


भावनाएं आगे निकल जाती हैं, और विवेक पीछे छूट जाता है।


ऐसे में ग़लतियाँ होती हैं। लेकिन सवाल यह नहीं कि उन्होंने क्या किया —


सवाल यह है कि हम क्या करें।


अगर हम समझदारी दिखाएं, तो इन्हें राह मिल सकती है।


इनकी गलती को सज़ा नहीं, दिशा दी जाए।


ताकि कल को ये दो जीवन संभाल सकें — न कि एक गलती का बोझ उठाएं।"


कमरे में गहरा सन्नाटा था। लड़की की माँ ने कहा,
“मुझे यह लड़का पसंद नहीं है। ये कोई काम नहीं करता और उसे नशे की लत भी है। अभी की गलतियों को सुधारने से कुछ नहीं होगा, बल्कि उनकी लापरवाही में हम भी नादानी कर बैठेंगे। अपनी लड़की को ले चलते हैं। किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। हम उसकी शादी किसी अच्छे घर में कर देंगे। ये लड़का तो अपनी मस्ती में लगा हुआ है, इन्हें भविष्य की कोई चिंता नहीं है। हम लोग उसके माँ-बाप हैं, जो सही होगा, वही करेंगे। देख लेना, जिस भावना में बहकर इन दोनों ने ये हरकतें की हैं, अगर वैसी ही स्थिति मिल जाए, तो यह सब भूल जाएँगे। यह प्यार-व्यार की बातें और इनकी भावनाएँ भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएँगी।”


बाकी लोग चुप हो गए। गोविंद ने कहा, "गाँव में बहाने बनाकर कुछ अफवाहें फैला दूँगा। दूर का रिश्तेदार था । गांव घुमने आई थी , आदि । मैं भी चाहता हूं  कि ये रिश्ता  मत जुड़े । "


सभी ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि फिलहाल दोनों बच्चों को समझा-बुझाकर अपने-अपने घरों में रखा जाएगा, जब तक कि कोई उपयुक्त वैवाहिक संबंध निश्चित नहीं हो जाता।


घटनाक्रम वैसा ही रहा, जैसा सभी ने मिलकर निर्धारित किया था। गोविन्द और उनकी पत्नी ने संतोष की सांस ली — "चलो, यह मामला शांतिपूर्वक सुलझ गया। अधिक बदनामी और कानूनी प्रक्रिया से बचाव हो गया। हमारा पुत्र क्षणिक उत्साह में आकर यह अनुचित कार्य कर बैठा।"


कुछ ही दिन बीते थे कि आशीष ने फिर वही बात दोहराई—


"अगर उस लड़की से मेरी शादी नहीं करा सकते, तो किसी और से करवा दो। वरना मैं उसे फिर से भगा लाऊंगा।"


गोविंद ने देखा, बेटे की आंखों में जिद थी... लेकिन उस जिद में प्रेम नहीं, बस एक अजीब-सी लालसा थी।


"यही तुम्हारा प्यार है?" वह धीमे स्वर में बोले, "वासना की लिप्सा तुम्हारे चेहरे पर साफ झलक रही है... बिल्कुल निर्लज्ज हो गया है तू।"


"कुछ भी कहो," आशीष ने ठंडी बेरुखी से जवाब दिया, "मैं नहीं जानता, और न ही किसी की सुनने वाला हूं।"


गोविंद चुप हो गया। एक बाप, जो अंदर से टूट रहा था, बाहर से कुछ कह भी नहीं पा रहा था।


उसे डर सताने लगा... कहीं जिस लड़की से आशीष की शादी हो, उसकी ज़िंदगी नर्क न बन जाए।


पर बाप आखिर बाप होता है। बेटा चाहे जितना भटक जाए, दिल तो उसके लिए ही धड़कता है।


गोविंद ने तय कर लिया—जो भी करना है, सोच-समझकर करना है।


अब जब भी किसी लड़की का रिश्ता देखने जाता, पहले ही अपने बेटे की सच्चाई साफ-साफ बता देता।


कहता—


"मैं कुछ छिपाना नहीं चाहता। रिश्ता बनने से पहले सब कुछ जान लीजिए, ताकि कल को कोई दुख, कोई पछतावा न रहे।"


आख़िरकार एक लड़की मिल ही गई — एक गरीब घर की, जिसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। चेहरा भी साधारण था। बेटे के आवारापन और जिद के कारण ऐसी लड़की को पसंद करना पड़ा। जब आशीष से पूछा गया कि लड़की कैसी है, तो उसने तुरंत 'हाँ' कह दिया।


पिता, गोविंद, उसके इस रवैये को भांप गए। समझ गए कि बेटे के मन में कुछ और ही चल रहा है।


शादी की रस्में चल रही थीं। उसी दौरान आशीष फ़ोन पर शारदा से बात कर रहा था। वह कह रहा था:


"लड़की ठीक है, लेकिन तुमसे कुछ कम है। तुम भी तो अपने लिए कोई और लड़का ढूंढ़ रही हो..."


"

हॉं, पर मुझे कोई पसंद नहीं आ रही है । "


उन दोनों के बीच प्यार के नाम पर कोई टकराव नहीं था। बातचीत ऐसे हो रही थी जैसे वे बहुत समझदार हों। दोनों एक-दूसरे के बिना भी खुश थे।


शादी में आए रिश्तेदार समझ रहे थे कि वह किसी पुराने दोस्त से बात कर रहा होगा। लेकिन गोविंद समझ गए कि यह वही शारदा है — पुरानी कहानी फिर से सिर उठाने लगी थी। उसकी बातें सुनकर गोविंद सहम गए। एक अनजाना भय उन्हें घेरने लगा — "कहीं यह फिर कोई ऐसा-वैसा कदम न उठा ले, जिससे पूरे परिवार की बदनामी हो जाए।"


थके-हारे गोविंद ने अपनी पत्नी से कहा,


"लगता है कुछ गलत हो रहा है। हमारा लड़का शायद अब भी नहीं सुधरेगा..."


पत्नी ने शांत स्वर में उत्तर दिया,


"चिंता मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा। आशीष अब अपनी शादी से खुश है। जो चीज वह शारदा में ढूंढ़ रहा था, वही अब उसे अपनी पत्नी में दिखाई देने लगी है। पेट अगर घर में ही भर जाए, तो कोई बाहर क्यों भटकेगा?"


"अप्राप्त चीजों की ओर ही सबसे ज़्यादा खिंचाव होता है। उसे तो मिल जाएगा ।
मैं तो उसी दिन समझ गई थी जब आशीष ने साफ़ शब्दों में शादी के लिए कह दी थी। यह कोई सच्चा प्यार नहीं है, यह सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण है जिसे आजकल के लोग 'प्यार' का नाम दे देते हैं। खोट तो अपने ही सिक्के में है... इन्हीं नादानियों की वजह से मां-बाप अपने बच्चों की शादी जल्दी कर देते हैं । "
गोविन्द सोचने लगा - सचमुच, इसी शारीरिक संबंधों को नब्बे फीसदी लोग प्यार का नाम दें देते हैं । शारीरिक आकर्षण और चाहत बस यही इनका प्यार है । बेशर्म लोग ।

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