अधूरी रह गई कविता | कविता और संवेदनाओं पर विचारपूर्ण हिंदी रचना Kavita adhuri rh gai meregeet sahitya jivan
कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं होती, बल्कि संवेदनाओं का वह संसार होती है, जहाँ मनुष्य अपने भीतर उतरता है। लेकिन आज के उपयोगितावादी समय में हर चीज़ को लाभ और उपयोगिता की कसौटी पर परखा जाता है। ऐसे में कविता अक्सर अकेली पड़ जाती है, क्योंकि उसका मूल्य पैसे से नहीं, अनुभव और अनुभूति से आँका जाता है। यही द्वंद्व इस कविता का मूल भाव है।
कविता पर हिंदी कविता
अधूरी रह गई कविता
अपने भीतर
बहुत गहरे उतरना चाहती थी कविता।
कल्पनाओं के सहारे,
अपने ही भावों के संसार में,
जहाँ उसे
सुकून मिलता था,
वहीं बस जाना चाहती थी।
पर बाहर की दुनिया
उसे अवहेलना की नज़रों से देखती रही।
कविता पर प्रश्न उठे,
उसकी कल्पनाओं पर भी।
पेड़ों से लेकर फूलों तक,
प्रेम से लेकर भूलों तक—
हर बात पर तर्क किए गए।
लोग पूछते रहे—
"आख़िर कविता से मिलता क्या है?"
न इससे
पेट भरता है,
न धन मिलता है।
जो अनुभूति थी,
उसे शब्दों में पूरी तरह समझाया न जा सका;
जो सौंदर्य था,
उसे सबको दिखाया भी न जा सका।
क्योंकि कविता
तर्क से नहीं,
संवेदना से समझी जाती है।
और जब संवेदनाएँ
समझी न गईं,
तो...
अकेली रह गई कविता।
फिर भी
वह लिखी जाती रही,
क्योंकि उसका उद्देश्य
बाज़ार नहीं,
मनुष्य का हृदय था।
और अंत में कविता
कविता का मूल्य उसकी उपयोगिता में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता में होता है। वह मनुष्य को अपने भीतर झाँकने, प्रकृति से जुड़ने और जीवन को गहराई से महसूस करने की प्रेरणा देती है। यदि समाज केवल लाभ के आधार पर साहित्य को आँकेगा, तो कविता अकेली पड़ सकती है, लेकिन उसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होगा। क्योंकि जब तक मनुष्य के भीतर भावनाएँ जीवित हैं, कविता भी जीवित रहेगी।

0 टिप्पणियाँ