सच और झूठ का अंतर: सोशल मीडिया और समाज की कड़वी सच्चाई | हिंदी कविता Poetry on Social Media

सच और झूठ का अंतर: सोशल मीडिया और समाज की कड़वी सच्चाई | हिंदी कविता Poetry on Social Media आज के समय में इंसान के पास जानकारी तो बहुत है, लेकिन समझ कम होती जा रही है।

सोशल मीडिया ने हमें जोड़ने के बजाय कई बार भ्रमित और दिशाहीन बना दिया है।

यह कविता उसी कड़वी सच्चाई को उजागर करती है—जहाँ लोग तर्क तो बहुत देते हैं, लेकिन सच्चाई से दूर होते जा रहे हैं !

सच और झूठ का अंतर: सोशल मीडिया और समाज की कड़वी सच्चाई | हिंदी कविता Poetry on Social Media

अंतर कर नहीं पाते

सच और झूठ में

निर्धारित नहीं है

समझ की सीमा

कभी भी मुंह खोल जाते हैं

कुछ भी बोल जाते हैं

उद्दंडतापूर्वक हठ है

अपनी बातों को

मनवाने के लिए

कई तर्क हैं

जिसकी दिशा ही नहीं है

कहां जाकर रूकेगी

कहां जाकर झुकेगी

लोग अपने मतलब में

इतने गिर गए हैं 

अपनी सीमा भूल गए हैं !!!!


लोगों के फुर्सत के पल 

आज और कल 

बीत रहे हैं , सोशल मीडिया पर 

जहां बीत रहा समय 

आराम से सफल 

मनोरंजन के बहाने 

सींच रहे हैं दिमाग को 

अनजाने में 

ऊल-जुलूल, फालतू ज्ञान से 

भ्रामक प्रचार विचार से 

दिशाहीन !!!


स्टेटस लगाकर 

अपनी खुशी बताई 

मगर मिलने कभी घर नहीं आई 

उसके रिश्ते वहीं तक बंधे हैं 

फारवर्ड किया ज्ञान 

बिल्कुल सधे हैं 

सब दूसरों के लिए 

भले ही वह गधे हैं  !!!

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