खुद से मुलाक़ात | आत्मसम्मान और जीवन दर्शन पर हिंदी कविता

खुद से मुलाक़ात | आत्मसम्मान और जीवन दर्शन पर हिंदी कविता

जीवन में एक समय ऐसा भी आता है, जब मनुष्य दूसरों से शिकायत करना छोड़ देता है और स्वयं को समझने लगता है। तब उसे एहसास होता है कि दुनिया का दिखावा क्षणिक है, जबकि आत्मसम्मान और आत्म-साक्षात्कार स्थायी हैं। यह कविता उसी मनःस्थिति की अभिव्यक्ति है, जहाँ कवि भीड़ से नहीं, बल्कि स्वयं से मिलने की इच्छा रखता है।

खुद से मुलाक़ात नहीं


मुझे दुनिया से कोई शिकायत नहीं,

ऐसा भी नहीं कि मेरी हैसियत नहीं।


मैं जानता हूँ ज़माने का हर चलन,

हर ऐरे-ग़ैरे से मेरी मोहब्बत नहीं।


चेहरों की भीड़ है, मुस्कानें भी बहुत हैं,

लेकिन दिलों में पहले-सी ख्यालात नहीं।


आडंबरों के मेले में सब मशगूल हैं,

सादगी की अब वैसी क़ीमत नहीं।


हम जब भी मिले, दोनों ख़ामोश रहे,

शायद उसे मुझसे या मुझे उससे मोहब्बत नहीं।


हर कोई अपनी ख़्वाहिशों का बोझ उठाए हुए है,

अब किसी के पास किसी की फुर्सत नहीं।


दौलत, शोहरत और नाम की दौड़ में,

इंसान बचा है, मगर इंसानियत नहीं।


चलो ऐ "राज़", लौट चलें अपने भीतर,

बहुत दिनों से खुद से मुलाक़ात नहीं।


भीड़ में रहकर भी तन्हा-सा हूँ मैं,

शायद अपने होने की अभी जज़्बात नहीं।


जो खुद को समझ ले, वही अमीर है,

बाक़ी दौलत में भी सच्ची राहत नहीं।

I-do-not-complain-to-the-world-Hindi-Ghazal

और अंत में कविता 

दुनिया की भीड़ में सबसे कठिन काम स्वयं से जुड़े रहना है। जब मनुष्य दिखावे से ऊपर उठकर अपने भीतर झाँकता है, तभी उसे शांति, आत्मसम्मान और जीवन का वास्तविक अर्थ मिलता है। दूसरों से मिलने से पहले यदि हम स्वयं से मिलना सीख जाएँ, तो जीवन कहीं अधिक सरल और सार्थक हो सकता है।
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