बात ये नहीं कि मुझमें बुराई है | आलोचना, सच्चाई और अनकही मोहब्बत पर कविता
रिश्तों में अक्सर लोग दूसरों की कमियाँ देखने लगते हैं, लेकिन स्वयं को देखने से बचते हैं। कभी आलोचना के पीछे ईमानदारी होती है, तो कभी पूर्वाग्रह। वहीं प्रेम में भी कई भाव ऐसे होते हैं जो शब्दों तक नहीं पहुँच पाते। यह कविता इन्हीं दो भावों—आलोचना और अनकहे प्रेम—को एक साथ व्यक्त करती है। पढ़िए इस पर कविता हिन्दी 👇
बात ये नहीं कि मुझमें बुराई है कविता
बात ये नहीं कि मुझमें बुराई है,
बात ये है कि तुमने वही दिखाई है
अगर इतने ही ईमानदार हो तो,
क्या बात है जो सबसे छुपाई है?
बहुत सुविधा है तुम्हें चयनात्मक होने में,
कहीं की बातें कहीं और सुनाई हैं
सच के टुकड़े जोड़कर अक्सर,
तस्वीर नई-नई बनाई है
बहुत बरसे बादल फिर भी प्यास बाकी है,
इन बादलों ने कैसी दुविधा जगाई है
उम्मीदों की धरती सूखी रह गई,
जबकि आँखों ने बारिश दिखाई है !!!!!
सच्चाई और आलोचना कविता
तेरी बातों का अर्थ खो गया कहीं,
फिर क्यों ये फ़िज़ूल बातें दोहराई हैं?
यदि सच कहना ही उद्देश्य था,
तो आधी सच्चाइयाँ क्यों बताई हैं?
जो दूसरों का हिसाब रखते हैं,
कभी ख़ुद का भी हिसाब करें।
आईना केवल सामने वाले को नहीं,
अपने चेहरे को भी जवाब दे !!!!
अनकही मोहब्बत
बात ये नहीं कि मुझमें बुराई है,
अभी तुमने अपनी कहाँ बताई है।
समझ रहा हूँ तुम्हें भी मोहब्बत है,
मगर तुमने ज़ुबाँ पर कहाँ लाई है।
गैरों-सा व्यवहार करते हो,
फिर भी कुछ छुपा-सा लगता है।
नज़रों की खामोशी अक्सर,
शब्दों से ज़्यादा कहती है !!!!
पास होकर भी दूरी रखना,
शायद कोई मजबूरी होगी।
दिल में चाहत हो सकती है,
पर उसे कहने में दूरी होगी !!!!
मोहब्बत केवल कह देने से नहीं होती,
कभी-कभी चुप्पी भी उसका हिस्सा होती है।
लेकिन जो प्रेम हमेशा अनकहा रह जाए,
वह मन में एक अधूरा किस्सा होती है!!!!
और अंत में कविता
रिश्तों में निष्पक्षता और ईमानदारी उतनी ही आवश्यक है जितनी प्रेम में स्पष्टता। केवल दूसरों की कमियाँ देखना पर्याप्त नहीं, स्वयं को भी समझना जरूरी है। और प्रेम यदि हो, तो उसे सम्मानपूर्वक व्यक्त करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसे महसूस करना।
इन्हें भी पढ़ें 👉 दुनिया से दूर अपनों के बीच में कहानी
0 टिप्पणियाँ