फ़ासला काम न आया | प्रेम, संवेदना और सामाजिक विडंबना पर हिंदी कविता

फ़ासला काम न आया | प्रेम, संवेदना और सामाजिक विडंबना पर हिंदी कविता fasla kaam na aaya hindi-kavita

कविता केवल प्रेम की भाषा नहीं होती; वह समाज का आईना भी होती है। कभी वह विरह की पीड़ा व्यक्त करती है, तो कभी भीड़, राजनीति और संवेदनहीनता पर प्रश्न उठाती है। प्रस्तुत रचना इन्हीं दो भावों का संगम है। पढ़िए इस पर कविता हिन्दी 👇 

फ़ासला काम न आया

 फासला काम न आया

दिल को आराम न आया

कभी ऐसा दिन न गुज़रा

मेरे होंठों पे तेरा नाम न आया

चलता रहा लगातार सफ़र में

सोचता हूॅं अभी मुकाम न आया

कुछ दूरी से रिश्ते खत्म नहीं होते

मेरी चाहत में कभी विराम न आया  !!!!

ध्यान और भीड़

ध्यान जाता नहीं 

इसलिए ज्ञान आता नहीं 

लोकतंत्र की विशेषता है 

भीड़ पसंद है 

अकेला आदमी के पास 

नेता जाता नहीं 

प्रेम की खासियत में शामिल हैं 

उसके यार को भीड़ भाता नहीं 

विषय उनके थे बिलख उठे 

विषय उनके थे, बिलख उठे,

गला काटा आतंकी ने, दर्द आता नहीं।

अपने-पराए में बँट गई संवेदना,

हर लाश पर मातम आता नहीं। !!!!

और अंत में कविता 

प्रेम हो या समाज, दोनों की नींव संवेदनशीलता पर टिकी होती है। जहाँ प्रेम में दूरी भी संबंधों को नहीं तोड़ती, वहीं समाज में संवेदना का अभाव मनुष्यों के बीच दूरी बढ़ा देता है। यदि हम भीड़ से ऊपर उठकर मनुष्य को मनुष्य की तरह देखना सीखें, तो रिश्ते भी बचेंगे और समाज भी।

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