तालीबान और उसके समर्थक कविता हिन्दी Ghazal on Taliban.

Ghazal on Taliban.

 कल तलक बुध्दिमान था आज तालीबान है

छुपा था अच्छी बातों से जो बुरा इंसान है

शक करना नहीं सीखा कभी मेरा हिंदुस्तान है

दिया बहुत मगर भूल गए कैसा दोगलेपन है

उसकी मोहब्बत में दोहरा मायने समझ न पाया

छुपा के रखे हैं गुप्त एजेंडा जिससे देश अनजान है

बहन बेटियों की इज्ज़त को तमाशा ये बनाते हैं

वक्त लगेगा इसे समझने में ये तो सियासतदान है !!!!

तालीबान और उसके समर्थक कविता हिन्दी

हम कितने तैयार हैं

शिक्षा को महत्व देने के लिए

या सियासत करने के लिए 

विचारधारा है नवीन कहके

अपना विचार थोपने के लिए !!!

ये दोगलापन 

सब कुछ तहस-नहस कर देगा 

क्योंकि 

जब ये अपना क़दम हर जगह रखेगा 

स्थापित मान्यताओं रिवाजों सिद्धांत को 

बिना समझे सवाल कर जाएगा !!!!!

सियासत जानते हो तो इसका मतलब यह नहीं हो 

कि तुम्हारी सोच ही सही हो 

तुम जिसके समर्थन कर रहे हो 

जरूरी है वो तुम्हारा भी समर्थक हो 

तुम दोनों में फिर अंतर क्या 

जो वो हो 

वो तुम ही हो !!!!

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