प्रेम में हूँ | अधूरे प्रेम, प्रतीक्षा और समर्पण पर हिंदी कविता intezar aur prem poem

प्रेम में हूँ | अधूरे प्रेम, प्रतीक्षा और समर्पण पर हिंदी कविता intezar aur prem poem

प्रेम केवल मिलन का नाम नहीं है। कई बार प्रेम अपने भीतर प्रतीक्षा, पीड़ा, धैर्य और निस्वार्थ समर्पण को भी समेटे रहता है। सच्चा प्रेम अधिकार नहीं माँगता; वह समझे जाने की आशा करता है। प्रस्तुत कविता प्रेम की उसी संवेदनशील यात्रा को व्यक्त करती है, जहाँ असफलता के बाद भी प्रेम जीवित रहता है और स्मृतियाँ जीवन का सहारा बन जाती हैं।

क्या प्रेम कर पाओगे?

क्या प्रेम कर पाओगे?

नित नए दर्द सह पाओगे?

प्रेमी की व्यथा आँखों में होती है,

क्या उन आँखों को पढ़ पाओगे?

जब शब्द साथ छोड़ देंगे,

क्या मौन का अर्थ समझ पाओगे?

खो जाते हैं लोग इस भीड़ में,

क्या हृदय में यादें सजा पाओगे?

जो उतरती-चढ़ती नहीं,

बल्कि ठहर जाती है दिल में,

क्या मेरी नज़रों में ठहर पाओगे?

मैं प्रेम में हूँ

प्रेम में असफल हूँ,

फिर भी प्रेम में हूँ।

हारकर भी

जीत की उम्मीद में हूँ।

धोखे मिले बार-बार,

दिल को समझाया बार-बार।

फिर भी न बदल सका मन,

क्योंकि मैं प्रेम में हूँ।

प्रेम कोई सौदा नहीं,

जो लाभ-हानि से बदल जाए।

यह तो वह दीप है,

जो आँधियों में भी जलता रहता है।

एक ही चाह

असफल होने की परवाह नहीं,

दर्द मिले, मगर कोई आह नहीं।

एक बार जिसे नज़रों में बसाया,

फिर किसी और की चाह नहीं।

यादों का साथ ही काफी है,

यदि मिलन की राह नहीं।

इंतज़ार

जीना तो चाहता हूँ

तुम्हारे साथ,

मगर जी नहीं पा रहा हूँ।

दर्द है सीने में,

मगर कह नहीं पा रहा हूँ।


तुम मेरे लिए

पूज्य हो गए हो,

इसलिए शिकायत नहीं,

बस प्रार्थना कर रहा हूँ।

जिस दिन तुम समझोगे

मेरे मौन का अर्थ,

शायद वही दिन

मेरे इंतज़ार का अंत होगा।

तब तक

मैं विश्वास के दीप को

बुझने नहीं दूँगा।

और अंत में कविता 

प्रेम का मूल्य केवल मिल जाने में नहीं, बल्कि उसे सच्चाई और सम्मान के साथ निभाने में है। कुछ प्रेम कहे नहीं जाते, फिर भी जीवन भर साथ रहते हैं। प्रतीक्षा, स्मृति और विश्वास भी प्रेम के उतने ही गहरे रूप हैं जितना मिलन।

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