बहुत दिनों बाद – गांव की यादें कविता bahut-dino-baad-gav-kai-yaadein kavita
जीवन में कभी-कभी हमें शहर की भागदौड़ और आधुनिक जीवन की व्यस्तता से विराम लेने की जरूरत महसूस होती है। यह कविता हमें उस अनुभव की ओर ले जाती है, जब मन शांत होकर गांव की प्राकृतिक सुंदरता में खो जाता है। बारिश की बूंदें, पेड़-पौधों की हरियाली, चांद और सितारों का सफ़र, और बरगद की छांव में महसूस की गई निश्चिंतता—ये सभी दृश्य हमें जीवन की सच्ची खुशी और शांति का अहसास कराते हैं। यह कविता याद दिलाती है कि प्रकृति और अपनेपन का अनुभव ही कभी-कभी सबसे बड़ी राहत और सुकून देता है ।
बारिश की कविताएँ
बहुत दिनों से बादल बरस रहे थे,
प्यासा मन नहीं तरसा था।
पेड़ों और पत्तों से,
धरती और अम्बर से,
जितनी धूल जमी थी,
सब मिट गई थी,
जब बारिश की बूंदें
धरती पर पड़ी थीं।
चांद और सितारे कविता
बहुत दिनों बाद,
शहर से गांव आया।
अचानक आसमान में
चांद नजर आया,
जो शहरों की बल्बों से ढंका था,
जिस पर ध्यान नहीं गया।
चांद आज भी सफ़र करता है,
सितारों के साथ।
शांति और अपनापन कविता
बहुत दिनों बाद,
धूप से झुलसने के बाद,
बरगद की छांव में,
अपने गांव में,
लगा कोई पूर्वज,
अपना हाथ फैलाए खड़ा है।
हिलते-डुलते जड़ें
गले लगाती हैं,
गहरी नींद से सुलाती हैं।
बहुत दिनों बाद,
निश्चिंतता का अनुभव हुआ।
-राजकपूर राजपूत "राज "
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