जहॉं दिल रहता है वहॉं तुम हो

जहाँ तुम हो | प्रेम और प्रकृति की अनुभूति पर हिंदी कविता jahan-tum-ho-prem-kavita

प्रेम केवल किसी व्यक्ति की उपस्थिति तक सीमित नहीं रहता। जब वह सच्चा होता है, तो प्रकृति, स्मृतियों, आशा और जीवन के प्रत्येक सुंदर क्षण में अनुभव होने लगता है। यह कविता उसी व्यापक प्रेम की अनुभूति को शब्द देती है।

जहाँ तुम हो

जहाँ दिल लगता है,
वहीं तुम हो।
जहाँ मेरा मन ठहरता है,
वहीं तुम हो।
तेरे बिना
मेरी ज़िंदगी अधूरी है,
मेरी साँसों की हर धड़कन में
सिर्फ़ तुम हो।
मैंने जब भी
पेड़ों की हरियाली देखी,
पत्तों की सरसराहट सुनी,
ऐसा लगा—
मुझे निहारती हुई
वहीं तुम हो।
बहती हुई नदी
धीरे से कहती है—
जहाँ प्रेम की धारा बहती है,
वहीं तुम हो।
उड़ते हुए परिंदों की
निश्चिंत उड़ान में,
खुले हुए आकाश की
स्वतंत्रता में,
मुझे हर बार
तुम्हारा ही अहसास होता है।
तूफ़ान चाहे
सब कुछ बिखेर दें,
मुझे विश्वास है—
फिर से सँवरती हुई
हर ज़िंदगी में
वहीं तुम हो।
कौन कहता है
ज़माने में प्रेम नहीं बचा?
जहाँ जीवन
मुस्कुराता है,
जहाँ उम्मीद
फिर से जन्म लेती है,
जहाँ हृदय
निस्वार्थ होकर धड़कता है—
वहीं तुम हो।
तुम किसी एक चेहरे का नाम नहीं,
तुम वह एहसास हो
जो हर सुंदर क्षण में
जीवन को अर्थ देता है।

और अंत में कविता 

सच्चा प्रेम दूरी से समाप्त नहीं होता, बल्कि वह मन की गहराइयों में बसकर जीवन का हिस्सा बन जाता है। तब हर हरियाली, हर नदी, हर उड़ता परिंदा और हर मुस्कुराता पल उसी प्रिय की उपस्थिति का एहसास कराता है। प्रेम अंततः एक व्यक्ति से आगे बढ़कर जीवन-दृष्टि बन जाता है।
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