विचार और समय | कट्टरता, चिंतन और परिवर्तन पर हिंदी कविता vichar aur samay hindi-kavita
कोई भी विचार जन्म लेते ही अंतिम सत्य नहीं बन जाता। समय उसकी परीक्षा लेता है। जो विचार स्वयं को समयानुकूल परिष्कृत करते रहते हैं, वे जीवित रहते हैं; और जो केवल आग्रह बन जाते हैं, वे कट्टरता में बदलने लगते हैं। यह कविता उसी चेतना का आह्वान करती है।
विचार और समय
हर विचार
समय की यात्रा से गुजरता है।
समय के साथ
उस पर परतें चढ़ती हैं,
कुछ रूढ़ियाँ जुड़ जाती हैं।
जो कभी नया था,
वह भी एक दिन
पुराना पड़ सकता है।
कुछ बातें
अपने समय में उपयोगी थीं,
पर बदलते युग में
अप्रासंगिक भी हो सकती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं
कि विचार गलत हो गया,
बल्कि यह कि
उसे समझने और परखने की
फिर से आवश्यकता है।
दुर्भाग्य तब शुरू होता है,
जब लोग
विचार की आत्मा को छोड़कर
उसके शब्दों से चिपक जाते हैं।
पत्थर पर खींची लकीर की तरह
उसे अंतिम मान लेते हैं,
बिना यह सोचे कि
समय ने कौन-से नए प्रश्न खड़े किए हैं।
महान विचारों को
त्यागने की नहीं,
समय-समय पर
आत्मपरीक्षण और परिष्कार की आवश्यकता होती है।
जहाँ प्रश्न पूछना बंद हो जाए,
वहाँ विचार
धीरे-धीरे कट्टरता में बदलने लगता है।
और जहाँ कट्टरता जन्म लेती है,
वहाँ संवाद कम,
दूरी अधिक हो जाती है।
विचार और इंसान
हर विचार कमजोर नहीं होता।
कमजोर तो तब होता है
जब उसे समझे बिना
केवल दोहराया जाने लगे।
किसी ने उसे जिया,
किसी ने उस पर चिंतन किया,
किसी ने अनुभव से परखा—
तभी वह विचार बना।
लेकिन
जब उसे अंतिम मानकर
चिंतन बंद कर दिया गया,
तभी लोग
लकीर के फ़कीर बन गए।
विचार तभी जीवित रहता है,
जब वह प्रश्नों से डरता नहीं;
और मनुष्य तभी जीवित रहता है,
जब वह सीखना बंद नहीं करता।
और अंत में कविता
विचारों का सम्मान उनका अंधानुकरण करने में नहीं, बल्कि उनकी आत्मा को समझते हुए समयानुकूल उनका परीक्षण करने में है। जो विचार प्रश्नों का स्वागत करते हैं, वे समाज को आगे बढ़ाते हैं; और जो प्रश्नों से डरते हैं, वे धीरे-धीरे कट्टरता का रूप ले लेते हैं।
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---राजकपूर राजपूत''राज''
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