रूठा मुकद्दर भी मंज़िल नहीं रोक सकता | कर्म, संघर्ष और आत्मविश्वास पर हिंदी कविता karma aur sangharsh poetry
जीवन में हर व्यक्ति ऐसे दौर से गुजरता है जब समय साथ नहीं देता, भाग्य प्रतिकूल लगता है और अपने भी मौन हो जाते हैं। ऐसे क्षणों में मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका कर्म, धैर्य और निरंतर प्रयास होता है। यह कविता उसी अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति है कि मंज़िल भाग्य से नहीं, बल्कि सतत प्रयास से मिलती है।
रूठा मुकद्दर भी मंज़िल नहीं रोक सकता
बेशक लम्हा मुझसे रूठा रहे
वक़्त हमारा मुझसे रूठा रहे
लेकिन मैं फिर भी जीऊॅ॑गा
बेशक मुकद्दर मुझसे रूठा रहे !!!
हाथों की लकीरें यूॅं ही मिट जाएंगे
परवाह नहीं जो भी लिखा रहे
कर्म करना मेरे हिस्से में है
परवाह नहीं भाग्य में कुछ भी लिखा रहे !!!
अभी तो रखा हूं कदम मैंने
चलना है कितनी दूर कहां जाना मैंने
मंजिल ठहर जाएंगी मुझे पता है
मुझे चलना है लगातार ये जाना मैंने
तक़दीर में लिखा मिट भी गए
अपनी कोशिशों में इतना रंग लाया मैंने !!!
जब मैं चर्चा करूं और वो चुप रहे
अहमियत खो चुकी है उससे भला अब क्या कहें !!!!
हारना भी एक कला है
हारना भी एक कला है,
जो समझे वही भला है।
हर ठोकर एक शिक्षक है,
हर गिरना नई दिशा है।
जो हारकर बैठ गया,
उसने जीवन खो दिया।
जो हारकर फिर उठ खड़ा हुआ,
उसने खुद को पा लिया।
जीत कभी अभिमान न बने,
हार कभी अपमान न बने।
दोनों को समभाव से जीना,
यही मनुष्य की पहचान बने।
कदम डगमगाएँ तो क्या,
इरादे नहीं डगमगाने चाहिए।
आँधियाँ चाहे जितनी आएँ,
दीपक फिर भी जलने चाहिए।
हार बताती है—
कहाँ कमी रह गई,
जीत बताती है—
मेहनत रंग ला गई।
जो अपनी भूलों से सीख गया,
वही समय के साथ बदल गया।
जो हर दोष दूसरों पर रखता रहा,
वह वहीं का वहीं रह गया।
भाग्य की रेखाएँ बदलें या न बदलें,
कर्म की राह नहीं बदलनी चाहिए।
मंज़िल देर से मिले तो भी,
उम्मीद नहीं बदलनी चाहिए।
याद रखना—
हार अंत नहीं,
अगली शुरुआत का द्वार है।
जो मुस्कुराकर फिर चल पड़े,
असल विजेता वही हर बार है।
और अंत में
भाग्य परिस्थितियाँ दे सकता है, लेकिन उनका उत्तर हमारे कर्म तय करते हैं। जो व्यक्ति निरंतर प्रयास करता है, हार से सीखता है और आत्मविश्वास बनाए रखता है, वही अंततः अपनी मंज़िल तक पहुँचता है।
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