मैं क्या कहूँ | अनकहे प्रेम और मौन की भावपूर्ण हिंदी कविता main kya kahun ankahe prem ki-kavita
कुछ भाव ऐसे होते हैं जिन्हें बोलना संभव नहीं होता। वे शब्दों के बजाय कविताओं में उतरते हैं और मौन के माध्यम से अपना अर्थ प्रकट करते हैं। प्रस्तुत कविता उसी अनकहे प्रेम, अधूरी अभिव्यक्ति और भीतर छिपी संवेदनाओं का चित्रण है, जहाँ कवि बोलने के बजाय लिखकर अपने मन की पीड़ा व्यक्त करता है।
अनकहे प्रेम की कविता
मैं क्या कहूँ
मैं क्या कहूँ?
बस इतना कि
मेरे अधर प्यासे हैं,
मेरा कंठ सूखा है,
मेरा हृदय
तेरे प्रेम का भूखा है।
मैं क्या लिखूँ?
कविताएँ ही लिखता हूँ,
क्योंकि
शब्द-शब्द मेरे
तेरे बिना अधूरे हैं।
तुम बिन
वे कभी पूरे नहीं होते।
तुम्हारी समझ
मेरी समझ से
भिन्न है,
शायद इसलिए
मेरे शब्द
तुम तक पहुँच नहीं पाते।
मैं क्या कहूँ
अपने हृदय की बात?
हर बार
तुम्हारी बातें सुनकर
मन पर
एक नया आघात लगता है।
इसीलिए
मैं चुप रह जाता हूँ।
तुम्हारी चाहत
मेरी चाहत से
अलग है।
शायद इसी कारण
मैं अपने ही भीतर
खोया रहता हूँ।
अपने दर्द को
अपने मौन में
समेटे हुए,
जिसे मैं
तुम्हारे सामने
कभी कह नहीं पाता।
मेरी कविताएँ ही
मेरी आवाज़ हैं,
जो वहाँ भी बोलती हैं
जहाँ मेरे होंठ
मौन हो जाते हैं।
और अंत में कविता
प्रेम हमेशा शब्दों का मोहताज नहीं होता। कई बार मौन, अधूरी पंक्तियाँ और अनकही कविताएँ भी वह कह देती हैं जो लंबे संवाद नहीं कह पाते। सच्ची संवेदना वही है जो अभिव्यक्ति से पहले हृदय में जन्म ले और समय के साथ भी अपना सत्य बनाए रखे।
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---राजकपूर राजपूत''राज''

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