थोड़ा-सा प्यार | समर्पण, विश्वास और सच्चे प्रेम पर हिंदी कविता thoda sa pyar samarpan-hindi-kavita
प्रेम केवल शब्दों या क्षणिक आकर्षण का नाम नहीं है। वह धैर्य, विश्वास, साथ और समर्पण की निरंतर यात्रा है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन जो संबंध सम्मान और विश्वास पर टिके हों, वे हर कठिन दौर में भी जीवित रहते हैं। यह कविता उसी प्रेम की बात करती है, जो स्पर्श से पहले संवेदना और वादों से पहले साथ निभाने को महत्व देता है।
समर्पण पर हिंदी कविता
काम बचा है थोड़ा सा
आराम बचा है थोड़ा सा
मुझे जाना है वहां तक
सफर बचा है थोड़ा सा
अभी ठहरो तुम पास मेरे
अरमान बचा है थोड़ा सा
इसी उम्मीद में जिंदा हूं
भरोसा बचा है थोड़ा सा
इस दौर में जीए कैसे राज़
अब प्यार बचा है थोड़ा सा !!!
ज़रूरी है कविता
होंठ चुमना जरूरी था
जैसे तुम्हें लगा था
समर्पण का भाव हो ऐसा
दो -एक हो जैसा
प्रेम का ये समर्पण
होंठों तक न हो
जब सफ़र में चलें तो
पैरों को चुम कर जगाना
सदा साथ निभाना
वादों से बड़े होते हैं !!!!
और अंत में कविता
सच्चा प्रेम क्षणिक आकर्षण से आगे बढ़कर जीवन की साझेदारी बन जाता है। उसमें सम्मान, विश्वास, धैर्य और एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व का भाव होता है। जो संबंध हर परिस्थिति में साथ निभाने का साहस रखते हैं, वही समय की कसौटी पर खरे उतरते हैं। प्रेम का सबसे सुंदर रूप वही है, जिसमें स्पर्श से अधिक संवेदना और वादों से अधिक निभाने की शक्ति हो।
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---राजकपूर राजपूत
1 टिप्पणियाँ
वाह वाह अति सुन्दर रचना सर जी नमस्कार
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