दोगले तर्क और समाज की सच्चाई: दीवार के इस पार की कहानी Hypocrisy poem in Hindi

दोगले तर्क और समाज की सच्चाई: दीवार के इस पार की कहानी Hypocrisy poem in Hindi
ज के समय में तर्क और प्रगतिशीलता के नाम पर कई लोग अपनी सुविधानुसार विचार प्रस्तुत करते हैं। वे स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न तो उठाते हैं, लेकिन हर विषय पर समान दृष्टिकोण नहीं रखते। यह कविता ऐसे ही दोगलेपन, सामाजिक पाखंड और आत्ममंथन की कमी को उजागर करती है।


दोगले तर्क और समाज की सच्चाई: दीवार के इस पार की कहानी  Hypocrisy poem in Hindi


ईश्वर की बातें तुम्हारी समझ से परे हो सकती हैं,
लेकिन यह बताओ—
क्या तुमने अपनी जंगली जीवनशैली जीने,
उच्छृंखलता अपनाने के लिए ही ऐसे तर्क गढ़े हैं?
ये बातें आजकल के सुविधावादी लोगों को
बहुत पसंद आती हैं।
स्थापित मान्यताओं और आदर्शों को कुचलकर
वे तर्क देते हैं—
पर उनके तर्कों में भी फर्क होता है।
हिन्दुओं के भगवान नहीं होते—
यह बात वे कई सवालों के साथ कहते हैं,
लेकिन बाकी मजहबों और पंथों के बारे में
न तो कह सकते हैं,
न ही कहना चाहते हैं।
यह एक प्रकार का लक्षित हमला है,
जहाँ सवाल और तर्क में अंतर है—
जिसे हम दोगलापन कह सकते हैं।
अपने तर्कों की गर्वोक्ति से
वे यह अहसास दिलाते हैं
कि वे तर्कशील और प्रगतिशील हैं,
जबकि उनका खोखलापन
वही समझ सकता है
जो उनके दोगलेपन को पहचानता है।
फिर भी वे अपने सड़े हुए विचारों का
इतना प्रचार-प्रसार और हल्ला करते हैं
कि कई बार सफल भी हो जाते हैं।

👇 कविता

दीवार के
इस पार खड़ा हुआ आदमी
दीवार के

उस पार नहीं जा सकता है।
इस पार भी आदमी रहता है,
उस पार भी—
लेकिन उस पार का आदमी
इस पार नहीं आता-जाता है।
इसलिए दीवार के
इस पार लिखता है,
क्योंकि उसके अपने यहीं रहते हैं।
कोयले से लिखता है
कुछ भी अनाप-शनाप,
गाली-गलौज—
ताकि पढ़ें उसके अपने
और शर्मिंदा हों।
यह जानकर कि
कोई उसका अपना ही
गालियाँ लिखता है,
जिसमें नफरत झलकती है—
उसकी दीवार पर,
जिसे नफरत है
हमारे कुछ व्यवहारों से।
जबकि दीवार उस पार भी है,
हमारी तरह ही—
लेकिन वहाँ
कुछ भी अनाप-शनाप
नहीं लिखा जा सकता।
दीवार का यह पार उसका है,
जहाँ वह मनमर्जी चला सकता है,
अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करता है—
जबकि उस पार जाने की
हिम्मत नहीं है,
हाथ-पांव फूल जाते हैं!
जानने के लिए
वह सब कुछ जानता है,
अच्छी बातों को—
लेकिन मानता नहीं है।
खुद के लिए
किसी ज्ञान को नहीं अपनाता,
बस दूसरों को
आगे बढ़ाना (फॉरवर्ड करना) है—
जिसमें वह माहिर है।
चर्चा होती रही
कई समस्याओं पर—
समाज पर, संस्कृति पर,
परंपराओं पर, रीति-रिवाजों पर—
विद्वत्तापूर्वक।
बस ध्यान नहीं रखा
अपनी गलतियों पर,
और कलयुग आ गया!

Hypocrisy poem in Hindi



दोगले तर्क और समाज की सच्चाई: दीवार के इस पार की कहानी  Hypocrisy poem in Hindi

 आज के समय में तर्क और प्रगतिशीलता के नाम पर कई लोग अपनी सुविधानुसार विचार प्रस्तुत करते हैं। वे स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न तो उठाते हैं, लेकिन हर विषय पर समान दृष्टिकोण नहीं रखते। यह कविता ऐसे ही दोगलेपन, सामाजिक पाखंड और आत्ममंथन की कमी को उजागर करती है।

 कविता समाज के उस वर्ग पर कटाक्ष करती है जो अपने विचारों को श्रेष्ठ बताने के लिए दूसरों की मान्यताओं पर सवाल उठाता है, लेकिन स्वयं अपने आचरण और कमजोरियों पर ध्यान नहीं देता।
“दीवार” यहाँ एक प्रतीक है—
👉 अपने क्षेत्र, अपनी सुविधा और अपने सुरक्षित दायरे का।
इस पार खड़ा व्यक्ति खुलकर बोलता है, आलोचना करता है, यहाँ तक कि अपशब्द भी लिखता है, क्योंकि उसे कोई रोकने वाला नहीं होता। लेकिन वही व्यक्ति दूसरी ओर जाकर सच का सामना करने या अपने विचारों को व्यवहार में लाने की हिम्मत नहीं करता।
🔹 मुख्य संदेश
तर्क तभी सार्थक है जब वह निष्पक्ष हो
केवल दूसरों की आलोचना करना आसान है, खुद को सुधारना कठिन
समाज की समस्याओं पर चर्चा से ज्यादा जरूरी है आत्मचिंतन
दिखावटी विद्वत्ता अंततः खोखली साबित होती है ।

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