विचारों का संघर्ष /vicharon-ka-sangharsh-hindi-kavita
हर युग में विचारों का संघर्ष रहा है। कुछ लोग परिवर्तन को प्रगति मानते हैं, तो कुछ परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को समाज की स्थिरता का आधार मानते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने विश्वासों, संस्कारों और जीवन-दृष्टि को चुनौती दी जाती हुई महसूस करता है, तब उसके भीतर अनेक प्रश्न जन्म लेते हैं। यह कविता उसी वैचारिक द्वंद्व और आत्मसंवाद की अभिव्यक्ति है।
विचारों का संघर्ष कविता
मैंने तुम्हारे विचारों में
बहुत कुछ अनावश्यक देखा है।
जिसे तुम विचार कहते हो,
वह मुझे कई बार
केवल शोर-सा लगा है।
तुम्हारा बुद्धिजीवी होने का दावा
कहीं न कहीं खोखला प्रतीत होता है,
क्योंकि केवल आंदोलित करना,
हर बात पर प्रश्न उठाना,
और अपने विचारों को थोपना
विचारशीलता नहीं होता।
जिसे तुम नफ़रत कहते हो,
और जिसे मैं प्रेम समझता हूँ,
तुम उसी में संशय भरकर
मुझे तोड़ना चाहते हो,
ताकि मैं भी
तुम्हारी दृष्टि से दुनिया देखूँ,
अपनी श्रद्धा और विश्वास को छोड़कर
तुम्हारे निष्कर्षों को अपनाऊँ।
इसीलिए नए विचारों के नाम पर
तुम मुझे बहलाते हो,
मगर मेरा ठहरना कठिन है
तुम्हारे उन विचारों में
जिनमें मुझे अपना सत्य नहीं दिखता।
हिंदी वैचारिक कविता
कितना पास आकर जाना
कि तुम हमारे नहीं हो।
विचारों की बहस बहुत देखी,
तर्कों के अनगिनत मेले देखे,
पर जब जीवन की बारी आई,
तो व्यवहार कहीं पीछे छूट गया।
अति स्वतंत्रता का आग्रह,
हर मर्यादा को चुनौती देना,
हर परंपरा को बंधन कहना,
और हर विश्वास को भ्रम बताना—
यह मुझे स्वीकार नहीं।
स्थापित मापदंडों,
संस्कारों और रीति-रिवाजों को
धीरे-धीरे धकेलकर
ढहा देना चाहते हो तुम,
जबकि जिन दीवारों को
तुम बंधन कहते हो,
उन्हीं में कहीं
पीढ़ियों का अनुभव बसता है,
उन्हीं में समाज की स्थिरता,
संबंधों की गरिमा
और जीवन की निरंतरता छिपी होती है।
शायद तुमने
उस स्पंदन को महसूस नहीं किया,
जो परंपरा के भीतर भी
जीवित रहता है।
---राजकपूर राजपूत''राज''
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