समय और इंसान | समय, आत्मचिंतन और असहमति पर दार्शनिक हिंदी कविता samay aur insaan darshanik-hindi-kavita
समय न मित्र होता है, न शत्रु। वह केवल जीवन का शिक्षक है। जो समय को दोष देता है, वह स्वयं को देखने से चूक जाता है। और जो मनुष्य के भीतर समानता खोज लेता है, वह मतभेदों के बीच भी मानवता को पहचान लेता है।
समय और इंसान
समय कभी-कभी कष्ट देता है,
ताकि तुम स्वयं को संभाल सको।
रुककर अपने भीतर झाँको,
और जीवन की नई राह चुन सको।
पर अक्सर लोग
समय को ही दोष दे जाते हैं।
अपनी भूलों का भार
उसके कंधों पर रख जाते हैं।
गलती समय की नहीं होती,
गलती हमारे दृष्टिकोण की होती है।
हम समय को
अपने नज़रिए से देखते हैं,
पर कभी
समय के नज़रिए से
खुद को नहीं देखते।
समय तो केवल आईना है,
जो हमें हमारा ही चेहरा दिखाता है।
सीखने वाला सीख जाता है,
और शिकायत करने वाला
शिकायतों में ही उलझा रह जाता है।
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चार लोग बैठे थे।
चारों की साँसें चल रही थीं।
एक ही हवा
सबके फेफड़ों तक पहुँच रही थी।
जीवित रहने के लिए
इतना ही पर्याप्त था।
फिर भी
उनके बीच बहस थी।
विचार अलग थे,
निष्कर्ष अलग थे,
सहमति कहीं दिखाई नहीं देती थी।
हवाएँ तो
सबके लिए एक-सी बह रही थीं,
साँसें भी
एक ही लय में चल रही थीं।
साँसों का आना-जाना
कह रहा था—
सब इंसान हैं।
लेकिन
उनकी असहमतियाँ बता रही थीं
कि अनुभव अलग हैं,
दृष्टियाँ अलग हैं,
और इसी भिन्नता से
संवाद का जन्म होता है।
मतभेद होना स्वाभाविक है,
मनभेद होना आवश्यक नहीं।
मगर लोगों ने सब-कुछ समझा
लेकिन मनभेद कर लिया
क्योंकि लोगों ने माना
हम सब अलग-अलग हैं !!!
और अंत में कविता
समय हमें तोड़ने नहीं, गढ़ने आता है। और मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान केवल उसके विचार नहीं, बल्कि विचारों के भिन्न होने पर भी मानवता बनाए रखने की क्षमता है। जो समय से सीख लेता है और असहमति में भी सम्मान रखता है, वही जीवन का वास्तविक अर्थ समझ पाता है।
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