मैं जिंदा हूॅं जब तक- विश्वास, संघर्ष और जीवन का सत्य कविता

जब तक जिंदा हूं– विश्वास, संघर्ष और जीवन का सत्य कविता /prem-vishwas-aur-jeevan-sangharsh-kavita


जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो समय के साथ दूर तो हो जाते हैं, लेकिन उनकी यादें मन में बनी रहती हैं। वहीं दूसरी ओर दुनिया के व्यवहार, स्वार्थ और संघर्ष भी इंसान को बहुत कुछ सिखाते हैं। यह कविता प्रेम, विश्वास, टूटे हुए रिश्तों और जीवन के संघर्षों के बीच खड़े रहने की जिजीविषा को व्यक्त करती है। पढ़िए इस पर कविता हिन्दी 👇 

प्रेम, विश्वास और जीवन संघर्ष पर हिंदी कविता


आखिर मेरी सॉंसों कब तक
  मेरी यादों में तू जब तक

तेरे नाम से दिल धड़केगा
   मैं जिंदा हूॅं जब तक !!!


हां मैं जिंदा हूं अब तक 
मगर तुने माना नहीं अब तक 

दिल तोड़ा है तुने आसानी से 
आखिर मैं समझूंगा नहीं कब-तक 

रिश्वत ली चाय-पानी के व्यवहार में 
पढ़े-लिखे लोगों की बातें नहीं समझूंगा कब-तक 

तुम अपने बारे में सोचें सबकुछ भूलकर 
अहसानफरामोश हो, समझूंगा नहीं कब-तक 

गिरने के भी तरीके हैं आदमियों के 
जानवरों जैसी चाल मैं देख रहा हूं अब तक 

नदियों की धार मोड़े, पहाड़ काटे 
मगर मुझे खड़ा होना है जिंदा हूं जब तक !!!!

दुनिया और आदमी कविता 


मैं डरा नहीं रहा हूं दुनिया मतलबी है 
मगर पहचान हर चेहरे को जो मतलबी नहीं है 

चालाकी को बुद्धिजीवी वर्ग में शामिल न कर 
मिलेंगे चेहरे बहुत ही कम यहां जो मतलबी नहीं है 

अभी उसकी बातों का मतलब मत निकाल 
साथ आएंगे वहीं जो मतलबी नहीं है !!!!


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