रिश्तों की कीमत और बदलता समय कविता/rishton ki keemat aur badalta samay
आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन समय कम हो गया है। लोग अपने परिवार की खुशियों के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, पर कई बार वही परिवार उनके साथ बिताए जाने वाले समय से वंचित रह जाता है। दूसरी ओर समाज में बढ़ती कृत्रिमता, दिखावा और संवेदनहीनता भी रिश्तों को प्रभावित कर रही है। यह कविता इन्हीं भावनाओं और यथार्थों को व्यक्त करती है।
दिलों में प्यार कहाँ है? कविता
यूॅं बेवजह सब नफ़रत पाले हैं
मानों सबके दिल में छाले हैं
बातों में सभ्यता है मगर बनावटी है
अब सबकी चालाकियॉं निराले हैं
उसका गम था या कोई बहाना था
यूॅं नशा के वास्ते सभी दीवाने हैं
कभी खत्म नहीं होती है मुश्किले
रोज-रोज खाने और कमाने हैं
धूप में जो तपा नहीं वो क्या जाने
भाषण में क्या है जिसे तुम्हें सुनाने हैं
अब कैसी फुहड़ता आ रही है गीतों में
मैं तो गुनगुनाता हूॅं जो गीत पूराने हैं
न दिन बदला है न रात बदली है "राज"
प्यार हो दिलों में तो हर मौसम सुहाने हैं !!!
सोती हुई बेटी कविता
बाप ने बेटी को नहीं देखा
बेटी ने बाप को
जब वे कमाने निकले
बेटी सो रही थी
जब वापस आया
तो बेटी सो रही थी
समय पर बधा हुआ आदमी
ओवरटाइम पर कमाता हुआ आदमी
परिवार का सुख ढूंढता है
लेकिन बाप सोती हुई बेटी देखता है
बेटी कमाते हुए बाप को नहीं देखी कभी !!!!
और अंत में कविता
रिश्ते केवल ज़िम्मेदारियों से नहीं, बल्कि साथ बिताए गए समय से भी मजबूत होते हैं। जीवन की भागदौड़ में कमाई आवश्यक है, लेकिन अपने प्रियजनों के लिए समय निकालना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रेम, अपनापन और उपस्थिति—यही रिश्तों की वास्तविक पूँजी है।
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---राजकपूर राजपूत''राज''

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