मेरी कविताएँ तुम्हारे स्पर्श से बाहर हैं | संवेदना और कविता पर हिंदी कविता poetry and sensitivity hindi
कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती; वह संवेदनाओं, अनुभवों और आत्मा की अभिव्यक्ति होती है। उसे समझने के लिए केवल बुद्धि नहीं, बल्कि हृदय की कोमलता भी चाहिए। जब कविता को केवल बाहरी दृष्टि से देखा जाता है, तो उसका वास्तविक सौंदर्य छूट जाता है। प्रस्तुत कविता इसी संवेदनात्मक दूरी को व्यक्त करती है।
मेरी कविताएँ
मेरी कविताएँ
तुम्हारे स्पर्श से बाहर हैं,
क्योंकि
तुम्हारी समझ
अब भी
उनकी अनुभूति से
बहुत दूर है।
तुम्हारी आकांक्षाएँ
भौतिक वस्तुओं को छूती हैं,
तुम्हारी ज़रूरतें
सुविधाओं में सिमटी हैं,
और तुम्हारा मन
आधुनिकता की चकाचौंध में
अपना प्रतिबिंब खोजता है।
वहीं,
मेरी कविताएँ
धीरे-धीरे
मुरझाने लगती हैं।
तुम्हारा स्पर्श
वैसा ही है,
जैसे कोई
खिले हुए फूल को
उसकी जड़ से तोड़ ले,
केवल
हाथों की सजावट के लिए,
या
गले के हार के लिए।
कुछ ही क्षणों में
वह फूल
अपनी ताज़गी खो देता है,
क्योंकि
उसका जीवन
उसकी जड़ों से जुड़ा था।
मेरी कविताएँ भी
उसी फूल की तरह हैं।
उन्हें
सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता,
महसूस किया जाता है।
वे
शब्दों में नहीं,
संवेदनाओं में खिलती हैं।
जो उन्हें
सिर्फ़ प्रदर्शन की वस्तु समझे,
उसके हाथों में
वे भी
धीरे-धीरे
मुरझा जाती हैं।
कविता का सौंदर्य
उसके शब्दों में नहीं,
उसकी आत्मा में होता है।
और उस आत्मा तक
वही पहुँचता है,
जो
स्पर्श से पहले
अनुभूति करना जानता हो।
और अंत में कविता
सच्ची कविता बुद्धि से अधिक हृदय की भाषा है। जो व्यक्ति केवल रूप देखता है, वह उसका बाहरी सौंदर्य पा सकता है; पर जो उसकी संवेदना को छू लेता है, वही उसकी वास्तविक आत्मा तक पहुँच पाता है।
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---राजकपूर राजपूत''राज''

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