सेलेक्टिव है सब स्वार्थ", "सफलता", और "बुद्धिजीविता
जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि सब कुछ यहीं रह जाना है। इसलिए ईर्ष्या, द्वेष और दिखावे में उलझने के बजाय प्रेम, विनम्रता और आत्मचिंतन को अपनाना अधिक सार्थक है। जो मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है, उसके लिए जीवन नाटक नहीं, बल्कि एक सार्थक यात्रा बन जाता है।
जीवन दर्शन पर हिंदी कविता
इस दौर में सेलेक्टिव है सब
हां स्वार्थ में एक्टिव हैं सब
व्यक्तिगत जीवन में यारों
खुद्दारी में निगेटिव है सब
ईमानदारी में अब दावा नहीं
बेमानी में पाॅजीटिव है सब
गलत है या सच है "राज़"
आज के दौर में सेलेब्रिटी है सब
किसी ने सच को चुना,
किसी ने सुविधा को।
विचारों की बिसात पर
कई लोगों ने
सिर्फ़ अभिनय किया।
बदलना था माहौल,
तो शब्द बदल दिए;
सच सामने आया,
तो अर्थ बदल दिए।
जिसे इंसानियत से
कोई सरोकार नहीं,
उसने अच्छी बातों में भी
नकारात्मकता खोज ली।
सभ्यता
केवल शब्दों में नहीं होती;
दृष्टि निष्पक्ष हो,
तभी उसका अर्थ होता है।
एक आँख बंद करके
दुनिया नहीं देखी जाती,
चयनात्मक नज़र
अंततः
सत्य से दूर ले जाती है।
और अंत में कविता
जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हम स्वयं को स्थायी मान बैठते हैं। इसी भ्रम से अहंकार, ईर्ष्या और संघर्ष जन्म लेते हैं। यदि मनुष्य मृत्यु की अनिवार्यता और जीवन की क्षणभंगुरता को सच में स्वीकार कर ले, तो उसके व्यवहार में विनम्रता, करुणा और प्रेम स्वतः आ सकते हैं। तभी यह नाटक जीवन की सार्थक यात्रा में बदल सकता है।
---राजकपूर राजपूत''राज''
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