प्रेम की परिभाषाएँ | शर्तों, विश्वास और समझौते पर हिंदी कविता
सच्चा प्रेम अधिकार से अधिक विश्वास का नाम है। जहाँ हर भावना का हिसाब रखा जाए, हर संबंध शर्तों में बंध जाए और हर अपनापन परिभाषाओं का मोहताज बन जाए, वहाँ प्रेम का सहज प्रवाह रुकने लगता है। यह कविता उसी प्रश्न को उठाती है कि क्या प्रेम सीमाओं में बंध सकता है?
प्रेम की परिभाषा कविता
एडजस्ट कितना?
कष्ट है जितना।
सिर्फ़ इश्क़ में
स्पष्ट है इतना।
परवाह है उसे,
ट्रस्ट है जितना।
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यदि परिभाषाओं में ही बंधना है,
तो मुझे
ऐसा साथ नहीं चाहिए।
समझौते के रिश्तों में,
जहाँ प्यार का भी
लेन-देन होता हो,
जहाँ अपनापन भी
शर्तों में तौला जाता हो।
कुछ मर्यादाएँ आवश्यक हैं,
पर अपनी ही सीमाओं में
कैद हो जाना
मेरा प्रेम नहीं है।
चलो, तुम ही कहो—
कहाँ तक मुझे जाना है?
एक रेखा खींच दो,
जहाँ मेरी सीमा हो।
तुम कहते हो—
यह सब ज़रूरी है
संबंधों के लिए।
मैं सोचता हूँ—
क्या प्रेम
सीमाओं से चलता है,
या विश्वास से?
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अब तक तो
मैं तेरे पास था।
मुझे
तेरा अहसास था।
लेकिन जब से
तुमने प्रेम की
परिभाषाएँ समझानी शुरू कीं,
तब से
मेरे भीतर
तुम्हारे अहसास की
तस्वीर बदलने लगी।
और अंत में कविता
प्रेम का आधार विश्वास, अपनापन और स्वीकृति है। मर्यादाएँ संबंधों को संतुलन देती हैं, लेकिन जब वे प्रेम से बड़ी हो जाएँ, तो आत्मीयता कम होने लगती है। सच्चा प्रेम बंधन नहीं, बल्कि ऐसा विश्वास है जिसमें दोनों व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता के साथ एक-दूसरे का सम्मान कर सकें।
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