इक रूह प्यासी-सी: प्रेम और वंचना की कविता
प्रेम एक ऐसा एहसास है, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। अक्सर समाज और लोग इसे अपनी सीमित परिभाषाओं में बांध देते हैं। यह कविता उसी अनुभव का मार्मिक चित्रण है, जब एक प्रेमी अपनी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता क्योंकि समाज की मान्यताएँ और दृष्टिकोण उसके प्रेम की सच्चाई को स्वीकार नहीं करते।
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इक रूह प्यासी-सी,
खुद से उदासी-सी,
इश्क़ में बन गई जो
पागली-सी, दीवानी-सी,
खैर, ये रोग ही ऐसा है,
समझो तो बात छोटी-सी,
अपनी-अपनी जिंदगी है,
लेकिन तू मेरी जिंदगी-सी!
प्यार करना अपराध नहीं था,
फिर भी लोगों ने इसे अनैतिक बताया,
प्यार करने का अर्थ शारीरिक बताया,
इसलिए जताई आपत्ति।
मैं अब किसी को कह नहीं सकता कि
मैं तुमसे प्यार करता हूं,
लोग यहीं समझेंगे
कि इसका शारीरिक जुड़ाव है।
इसलिए तो यह लगाव है,
जबकि मैं उसे जब भी देखता हूं,
उसके लिए जीना चाहता हूं,
उसके दुःख, उसकी पीड़ा,
स्वयं पर लेना चाहता हूं।
मुझे सुकून मिलता है,
उसके आसपास रहकर,
उसकी खुशियों के लिए जीकर।
मैंने प्यार का यही अर्थ समझा,
फिर भी मैं उसे कह नहीं सकता।
उसने भी लोगों की बातें सुनी होंगी।
जब मैं इज़हार करूंगा,
वे मुझे गलत मानेंगे।
लोगों की दी गई परिभाषा,
अब उसका दृष्टिकोण बन गई है।
कितना वंचित हो जाता है
एक प्रेमी,
लोगों के मनगढ़ंत विचारों से।
प्रेम की इस परिभाषा में
वह अपने प्यार की मदद नहीं कर सकता!
🔹 संदेश और विचार कविता
समाज और लोगों की मान्यताओं से सच्चा प्रेम अक्सर दब जाता है।
प्यार सिर्फ शारीरिक जुड़ाव नहीं है; यह भावनाओं, समझ और समर्पण का अहसास है।
जब बाहरी धारणाएँ हावी होती हैं, तो प्रेमी अपने प्यार को पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर पाता।
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---राजकपूर राजपूत''राज''

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