आज के समय में “सच्चाई” से ज्यादा “प्रस्तुति” महत्वपूर्ण हो गई है।
लोग सच बोलने के बजाय उसे सजाने, घुमाने और आकर्षक बनाने में अधिक विश्वास करने लगे हैं।
यह कविता उसी मानसिकता पर एक तीखा प्रश्न है—
👉 क्या हम अपनी मौलिकता खो चुके है -
✍️ कविता: मौलिकता बनाम दिखावा
Life reality Hindi poem
मौलिकता के साथ सहज बोल सकते थे,
पर तुमने बातों को घुमा दिया,
अपने मूल स्वरूप से अलग
एक नया चेहरा बना लिया।
क्योंकि नैतिकता, आदर्श और सामाजिक मूल्यों पर
तुम स्नातक हो,
नफ़ा-नुकसान के हर पहलू को
भली-भांति समझते हो।
तुम्हें वही ठीक लगा,
जो तुम्हें ठीक लगा—
सच की सरल राह छोड़कर
तुमने जटिल रास्ता चुन लिया।
यूँ सहजता से मिलने पर
प्रभाव नहीं पड़ता,
शायद यही सोचकर
तुमने शब्दों में रंग भर दिया।
मौलिकता में तुमने
मिर्च, मसाला, धनिया और मीठा भी डाला,
ताकि स्वाद बढ़े—
और लोग आकर्षित हों,
भले ही सच्चाई पीछे छूट जाए।
अंततः तुम्हारी लालच, तुम्हारा मोह
खुलेआम स्वीकार नहीं कर सकते थे,
इसलिए तुमने उसे
सजाकर, सँवारकर
एक आदर्श का रूप दे दिया।
पर सच तो यही है—
जहाँ दिखावा बढ़ता है,
वहाँ मौलिकता खो जाती है।
जो सहज था, वही सच्चा था,
पर तुमने उसे भी
स्वार्थ की परतों में ढक दिया।
और अंत में—
तुमने जो पाया,
वह प्रशंसा तो थी,
पर सच्चाई नहीं !!!!
वो सच बोल ही देता मगर
उसकी शिक्षा कहती थी
आजकल बनावटी में
फायदे हैं !!!
यह कविता उन लोगों पर कटाक्ष करती है जो अपनी असलियत छिपाकर, दिखावे और सजावट के माध्यम से खुद को बेहतर साबित करने की कोशिश करते हैं।
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“अगर यह कविता आपको सच्चाई के करीब लगी हो, तो इसे शेयर जरूर करें।”
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