प्रेम एक ऐसी भावना है जो दिल से जुड़ी होती है, लेकिन हर बार उसे स्वीकार नहीं किया जाता। जब सच्चा प्रेम भी अस्वीकार हो जाता है, तब मन में एक गहरी पीड़ा और अधूरापन रह जाता है। लोग केवल अपनी सुविधा अनुसार जीना चाहता है । कुछ लोगों को प्रेम से कोई ताल्लुक नहीं होता है । उसकी जिंदगी में प्रेम जैसी चीज़ न तो महसूस होती है न ही जरूरी लगती है ।
यह हिंदी कविता उसी दर्द को व्यक्त करती है, जहाँ प्रेम सच्चा था, लेकिन सामने वाले ने उसे समझा नहीं।
✍️ प्रेम ने जब अस्वीकार किया
प्रेम ने जब अस्वीकार किया,
इसलिए नहीं कि
मैंने प्रेम नहीं किया।
किया था उसे बहुत प्यार,
लेकिन उसने अस्वीकार किया।
जब तक बरसे बादल,
उसकी चाह से ज़्यादा बरसा,
उसने कहा—अब बंद करो,
फसलों को बर्बाद किया।
प्रेम ने जब अस्वीकार किया,
इसलिए नहीं कि
मैंने प्रेम नहीं किया।
फूलों को खलल नहीं पड़ता
तितलियों के आने-जाने से,
गले से लगाया उसने
जब मुझे अपना मान लिया।
पर भँवरे के आ जाने से
उसे कमी नहीं लगी,
तितलियों को ही उसने
अब मना कर दिया।
प्रेम ने जब अस्वीकार किया,
इसलिए नहीं कि
मैंने प्रेम नहीं किया।
सुविधा को उसने जीवन माना,
अपने-पराए में अंतर जाना,
अब किसी को कैसे चाहे,
जब अपनेपन को ही बेकार माना।
आँखों ही आँखों में
उसने इंकार किया—
प्रेम ने जब अस्वीकार किया,
इसलिए नहीं कि
मैंने प्रेम नहीं किया...!!!
उसे कोई चाहें तो चाहें कैसे
प्यार करें तो करें कैसे
मतलब निकालना है जिसे
प्रेम को इशारों-इशारों में
नजरअंदाज करें जैसे
हम तो दिल से हारे हैं
प्रेम आ गया
इसलिए हारे हैं
सहज मिल जाएं जिसे
वो सम्मान करें तो करें कैसे ???
भावार्थ
यह कविता एकतरफा प्रेम की पीड़ा को दर्शाती है।
प्रेम सच्चा था, लेकिन समझा नहीं गया
भावनाएँ गहरी थीं, लेकिन स्वीकार नहीं हुईं
संबंध सुविधा और स्वार्थ के कारण टूट गया
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